गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित करना समय की आवश्यकता, समिति ने उठाई आवाज
देहरादून, 17 जनवरी। स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति का नेतृत्व कर रहे समिति के राजेंद्र प्रसाद कंडवाल, पूर्व निदेशक (उड़ान योग्यता), उड्डययन निदेशालय ने एक व्यक्तव्य में कहा है कि उत्तराखंड किसी राजनीतिक उपकार से नहीं, बल्कि अपने लोगों के संघर्ष, बलिदान और रक्त से बना राज्य है। 1–2 अक्टूबर, 1994 की रामपुर तिराहा (मुज़फ्फरनगर) की घटना उत्तराखंड राज्य आंदोलन का वह काला अध्याय है, जिसमें निहत्थे आंदोलनकारियों पर निर्मम हमला हुआ, सात लोगों की जान गई और महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। यही बलिदान 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड के राज्य निर्माण का आधार बने।
उन्होंने कहा कि जनवरी 2026 में एडीजे न्यायालय द्वारा रामपुर तिराहा कांड के दोषी पीएसी कर्मियों को आजीवन कारावास की सज़ा देना और इस कांड की तुलना जलियांवाला बाग से करना इस अपराध की गंभीरता को दर्शाता है। इसके बावजूद अनेक वरिष्ठ अधिकारी आज भी जवाबदेही से बचते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि 2 अक्टूबर 2025 को उत्तराखंड ने इस घटना की 31वीं वर्षगांठ काला दिवस के रूप में मनाई, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य निर्माण के 25 वर्ष बाद भी उत्तराखंड आज तक स्थायी राजधानी से वंचित है। जनभावनाओं के विपरीत देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया, जबकि गैरसैंण भौगोलिक, प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से राज्य के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। वर्ष 2020 में गैरसैंण को ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ घोषित किया जाना केवल प्रतीकात्मक साबित हुआ।
राजेंद्र प्रसाद कंडवाल ने कहा कि गैरसैंण के नाम पर अवसंरचना में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, परंतु वर्ष में मात्र 1–2 दिन चलने वाले विधानसभा सत्र राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ बन गए हैं। माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ भी इस व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करती हैं। पहाड़ों में रहकर नीति निर्माण की मूल भावना लगातार कमजोर हुई है, जिसका सीधा असर राज्य के समग्र विकास पर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि इसके दुष्परिणाम आज स्पष्ट हैं—
स्थानीय रोजगार के अभाव में बड़े पैमाने पर पलायन और खाली होते गाँव, मानव–वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि, काग़ज़ों तक सीमित चिकित्सा सुविधाएँ, छात्रों के बिना स्कूल, चीन सीमा से लगे संवेदनशील क्षेत्रों में जन सांख्यिकीय बदलाव, भूमि क़ानूनों के अभाव में सांस्कृतिक क्षरण और लगभग ₹70,000 करोड़ का राज्य पर कर्ज।
उन्होंने चेतावनी दी कि आगामी परिसीमन के बाद स्थिति और भी जटिल हो सकती है। सरकार का ढुलमुल और उदासीन रवैया इन समस्याओं की जड़ में रहा है, जैसा कि देश के अन्य पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों में देखा गया है।
बयान में कहा गया कि “गैरसैंण को राजधानी बनाओ” की मांग कोई उग्र या अव्यावहारिक मांग नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की अस्मिता, संतुलित पर्वतीय विकास और राज्य निर्माण की मूल भावना की पुनर्स्थापना की मांग है।
इस आंदोलन में प्रमुख रूप से विनोद प्रसाद रतूड़ी, रमेश थपलियाल, जे.एस. गोसाई, सुनील जदली, जे.एस. रावत, अनिल बहुगुणा, लक्ष्मी प्रसाद, दान सिंह मिंगवाल, बलबीर सिंह धर्मवान, वरुण चंदोला सहित अनेक कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
कंडवाल ने कहा कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करना भले ही सभी समस्याओं का त्वरित समाधान न हो, लेकिन यह उनके समाधान की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा और उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी। यदि सरकार की राय भिन्न है, तो उसे जनता को देरी, खर्च और मूल प्रश्न—राज्य क्यों बनाया गया और किसके लिए बनाया गया—पर पारदर्शी उत्तर देना चाहिए।
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