लखनऊ अग्निकांड: नियमों की कमी नहीं, अनुपालन की विफलता से सीख लेने का समय
----- नजरिया/ डॉ संजय चतुर्वेदी ------
हाल ही में हुआ लखनऊ अग्निकांड हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद सामान्य प्रतिक्रिया यह होती है कि नियम और कड़े कर दिए जाएँ, नई शर्तें जोड़ दी जाएँ या और अधिक अनुमतियों की आवश्यकता बना दी जाए। परंतु वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे पास नियमों की कमी है, या समस्या उनके प्रभावी अनुपालन की है?
मेरे अनुभव में समस्या मुख्यतः नियमों के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन और निरंतर अनुपालन की है।
बदलता भारत, बदलते शहर
पिछले 40–50 वर्षों में हमारे शहरों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। जो भवन कभी केवल आवासीय उपयोग के लिए बने थे, उनमें आज क्लीनिक, कार्यालय, कोचिंग सेंटर, छोटे अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, दुकानें और अन्य व्यवसाय संचालित हो रहे हैं।
यह परिवर्तन केवल लालच का परिणाम नहीं है। इसके पीछे आर्थिक वास्तविकताएँ हैं—
- व्यावसायिक संपत्ति अत्यंत महंगी हो चुकी है।
- किराया और सुरक्षा जमा छोटे उद्यमियों की पहुँच से बाहर हैं।
- नए व्यवसायों के लिए प्रारंभिक निवेश बहुत अधिक है।
- छोटे व्यापारी और पेशेवर अपने घर से ही काम शुरू करने को विवश होते हैं।
इसलिए हर आवासीय भवन में चल रहा व्यवसाय अवैध मानसिकता का परिणाम नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता का परिणाम भी हो सकता है।
केवल नियम कठोर करने से समाधान नहीं
यदि प्रत्येक छोटे व्यवसाय पर बड़े मॉल, बड़े अस्पताल या बहुमंजिला वाणिज्यिक भवन जैसी शर्तें लागू कर दी जाएँगी तो अधिकांश छोटे व्यवसाय या तो बंद हो जाएँगे अथवा अनौपचारिक और गैर-पारदर्शी व्यवस्था की ओर चले जाएँगे।
इसलिए नियमों में व्यावहारिकता आवश्यक है।
सरकार का यह कहना उचित है कि कुछ परिस्थितियों में नियमों में शिथिलता विकास और जनहित के लिए आवश्यक होती है। परंतु शिथिलता का अर्थ सुरक्षा की उपेक्षा नहीं होना चाहिए।
वास्तविक समस्या कहाँ है?
हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या है कि—
- कागज़ों में अनुपालन है, व्यवहार में नहीं।
- फायर एनओसी है, पर अग्निशमन उपकरण कार्यशील नहीं।
- आपातकालीन सीढ़ियाँ हैं, पर ताले लगे हैं।
- निकास मार्ग हैं, पर सामान से भरे हुए हैं।
- अलार्म लगे हैं, पर वर्षों से परीक्षण नहीं हुआ।
- अग्निशमन अभ्यास (फायर ड्रिल) कभी आयोजित नहीं किए जाते।
यह स्थिति छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है। कई बड़े अस्पतालों, होटलों, विद्यालयों और वाणिज्यिक भवनों में भी ऐसी कमियाँ पाई जाती हैं।
सरकार की जिम्मेदारी
- नियमों को सरल और पारदर्शी बनाना।
- छोटे व्यवसायों के लिए व्यवहारिक अनुपालन मॉडल विकसित करना।
- ऑनलाइन और भ्रष्टाचार-मुक्त अनुमोदन प्रणाली बनाना।
- अग्नि सुरक्षा उपकरणों पर प्रोत्साहन और सहायता देना।
- नियमित निरीक्षण को कागजी कार्यवाही के बजाय वास्तविक सुरक्षा से जोड़ना।
व्यवसायी की जिम्मेदारी
- सुरक्षा को अनावश्यक खर्च न मानना।
- निकास मार्ग और सीढ़ियाँ खुली रखना।
- विद्युत प्रणाली का समय-समय पर परीक्षण कराना।
- कर्मचारियों को आपातकालीन स्थिति के लिए प्रशिक्षित करना।
- न्यूनतम अग्नि सुरक्षा उपकरणों को कार्यशील रखना।
समाज और नागरिकों की जिम्मेदारी
- अवरुद्ध निकास और असुरक्षित भवनों को सामान्य न मानना।
- अग्नि सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
- सुरक्षा नियमों का पालन करने वाले संस्थानों को प्रोत्साहित करना।
समाधान क्या हो?
1. जोखिम आधारित वर्गीकरण (Risk Based Classification) अपनाया जाए।
2. छोटे प्रतिष्ठानों के लिए न्यूनतम और किफायती सुरक्षा मानक बनाए जाएँ।
3. सभी सार्वजनिक उपयोग वाले भवनों में वार्षिक अग्नि सुरक्षा समीक्षा हो।
4. प्रत्येक संस्थान में नियमित फायर ड्रिल अनिवार्य हो।
5. निरीक्षण और प्रमाणन प्रक्रिया पूर्णतः डिजिटल और पारदर्शी हो।
6. भ्रष्टाचार और बिचौलिया संस्कृति को समाप्त किया जाए।
7. पुराने भवनों के लिए चरणबद्ध सुधार योजना बनाई जाए।
8. सुरक्षा अनुपालन को दंडात्मक नहीं बल्कि सहयोगात्मक दृष्टिकोण से लागू किया जाए।
लखनऊ की सीख
लखनऊ अग्निकांड हमें यह सिखाता है कि दुर्घटनाएँ केवल नियमों की कमी से नहीं होतीं। अधिकतर दुर्घटनाएँ तब होती हैं जब नियम कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं और वास्तविक जीवन में उनका पालन नहीं होता।
आज आवश्यकता नए नियम बनाने से अधिक इस बात की है कि जो नियम हैं, उनका ईमानदारी, पारदर्शिता और व्यावहारिकता के साथ पालन कराया जाए।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहाँ व्यवसाय करना भी संभव हो, विकास भी जारी रहे और नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
यही लखनऊ अग्निकांड की सबसे बड़ी सीख है।
- डॉ. संजय चतुर्वेदी
(लेखक आगरा के वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ हैं। वे सड़क सुरक्षा उपायों की सरकारी समिति से भी जुड़े रहे हैं।)
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