"उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए"- उर्दू गजल के शहंशाह बशीर बद्र नहीं रहे, 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे

नई दिल्ली, 28 मई। उर्दू गजल के शहंशाह कहे जाने वाले मशहूर शायर पदमश्री डॉ. बशीर बद्र नहीं रहे। वे 91 वर्ष के थे। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में उनका इंतकाल हुआ। बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई थी।
डॉ. बशीर ने 500 से ज्यादा मुशायरे किए थे। उन्होंने भारत के अलावा अमेरिका, पाकिस्तान और ब्रिटेन में भी मुशायरों में शिरकत की। डॉ. बद्र की शायरी का सबसे ख़ास पहलू यह है कि उन्होंने ग़ज़ल को आसान लफ़्ज़ों में ढाला। उन्होंने उर्दू शायरी को किताबी संजीदगी से निकालकर आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा बनाया। साहित्य के क्षेत्र में उनके इसी ऐतिहासिक योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनके निधन की खबर से देश-विदेश के लाखों प्रशंसकों में मायूसी छा गई है।
डॉ. बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत का ख़ुलूस, ज़िंदगी की तल्ख़ी, शहरी भाग-दौड़ की बेचैनी और हिंदुस्तानी मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है। उनके शेर सड़क से लेकर संसद तक गूंजते रहे हैं। उनकी ग़ज़लों ने देश-दुनिया में लोगों के दिलों को छुआ और ज़ुबानों पर चस्पा हो गए।
बशीर ने लगातार 60 साल तक मुशायरों में हिस्सा लिया था। वे दिन में आराम करते थे और देर रात तक मुशायरों में जाते थे। डिमेंशिया के बाद भी यही उनका रूटीन सेट हो गया था, वे रात में जागते, और दिन में सोते थे। पिछले कुछ सालों के दौरान वे अपनी गजलें सुना करते थे।
उत्तरप्रदेश के कानपुर में 15 फरवरी, 1935 को जन्मे बशीर बद्र ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी। उन्हें मक़बूलियत मिली इस शेर से-
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
1960 के दशक में इस शेर को मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने अपने हाथों से लिखकर एक मैगज़ीन को दिया। बस, फिर क्या था! बशीर बद्र की शोहरत का सफ़र तेज़ हो गया।
उनकी शायरी महज़ हुस्न और इश्क़ तक महदूद नहीं रही। समाजी मुद्दों पर भी उन्होंने बेबाकी से लिखा। मुल्क के बँटवारे के दर्द को उन्होंने इस तरह बयान किया-
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
ये शेर उन्होंने शिमला समझौते के मौक़े पर पढ़ा था। फिर जब उन्हें पाकिस्तान से मुशायरे का बुलावा मिला, तो वहां भी यही शेर पढ़ा और महफ़िल में सन्नाटा छा गया।
वर्ष 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया। यह हादसा उनके लिए बेहद तकलीफ़देह था। इस दर्द को उन्होंने अपने अशआर में समेटा-
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
इस हादसे के बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बना लिया और वहीं के होकर रह गए।
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डॉ. बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। एमए कोर्स में उनके शेर भी शामिल थे। तालीम में भी अव्वल डॉ. बद्र का अक़ली सफ़र भी लाजवाब रहा। वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट थे। दिलचस्प बात यह रही कि जब वे वहां पढ़ने गए तो एमए के कोर्स में उनके ख़ुद के अशआर शामिल थे।
करीब 15-16 साल की उम्र में उनके वालिद का इंतिक़ाल हो गया था। मजबूरन उन्होंने पुलिस की नौकरी ज्वॉइन कर ली। मगर शायरी से इश्क़ बरक़रार रहा। इस दौरान उन्हें तरक़्क़ी की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और एक यादगार शेर कह दिया-
“बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना 
दरिया जहाँ समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता।”
ओहदा पाने के बाद कई लोगों में गुरुर जाता है। वे भ्रम पाल लेते हैं। ऐसे बंदों को भी उन्होंने चेताते हुए लिखा था-
“शोहरत की बुलंदी भी पलभर का तमाशा है 
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।”
बशीर की पत्नी राहत बद्र अच्छी लेखिका और शिक्षिका रही हैं। उन्होंने न केवल घर को संभाला, बल्कि उनकी साहित्यिक यात्रा में सबसे बड़ी 'सपोर्ट सिस्टम' के रूप में काम किया। बशीर अक्सर कहते कि उनकी शायरी की कई बारीकियों और गजलों के मुकम्मल होने में पत्नी का बहुत बड़ा हाथ रहा है। वह उनकी सबसे ईमानदार आलोचक रही हैं। उनकी शादी के बारे में कहा जाता है कि वे दोनों एक-दूसरे की शख्सियत को पूरा करते हैं।
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