चैंबर चुनाव: सहमति बनाने के शुरुआती प्रयासों को झटका! अपनी-अपनी जीत के दावे, जातिगत जोड़तोड़ से इनकार

आगरा, 06 मार्च। नेशनल चैम्बर ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स यूपी आगरा के वार्षिक चुनावों में कुछ वरिष्ठ सदस्यों के प्रमुख पदों पर आम सहमति बनाने के शुरुआती प्रयासों को झटका लगा है। 
चुनाव प्रचार में कमर कसकर लगे प्रत्याशियों द्वारा अभी अपनी-अपनी जीत के दावे किए जा रहे हैं और सहमति के प्रयासों से दूरी बना रखी है। सूत्रों का दावा है कि कुछेक बुजुर्ग सदस्यों ने अन्य बुजुर्गों से बैठक करके एकराय बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन उनके प्रस्ताव पर तुरंत सहमति नहीं बन सकी। इनमें से कुछ बुजुर्ग सदस्य अध्यक्ष पद पर एक प्रत्याशी की जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रहे हैं तो कुछ अन्य दूसरे प्रत्याशी की जीत को लेकर आश्वस्त हैं। 
बुजुर्ग सदस्यों का मानना है कि यदि अध्यक्ष पद पर सहमति बना ली जाए तो अन्य पदों पर सहमति बनने में देर नहीं लगेगी। लेकिन अध्यक्ष पद के दोनों प्रत्याशियों के साथ जुड़े कुछ वरिष्ठ साथी जीत होने के दावे कर रहे हैं। इस कारण बैठक होने की स्थिति नहीं बन पा रही है। 
उधर कुछ बुजुर्ग सदस्यों ने चुनावों में संविधान संशोधनों का पालन न होने का आरोप लगाते हुए ऐसी किसी बैठक में शामिल होने से ही इनकार कर दिया। बुजुर्ग सदस्यों के एक ग्रुप में पिछले दिनों संविधान को लेकर सवाल भी उठे, इक्का-दुक्का लोगों ने समर्थन किया, लेकिन शेष सदस्य चुप बने रहे। एक सदस्य ने यह भी कह दिया कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, अतः संविधान संबंधी मुद्दों पर इसके बाद विमर्श किया जाए। समझा जाता है कि चुनावों के तुरंत बाद यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा सकता है।
फिलहाल प्रत्याशियों का एक गुट अपने प्रचार को लेकर खुलकर चर्चा कर रहा है तो दूसरा गुट पूरी गम्भीरता से मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में जुटा हुआ है। रोजाना मतदाता सूची के अनुसार सदस्यों से संपर्क किया जा रहा है। होली मिलन समारोह का दौर धीमा पड़ने से व्यक्तिगत मुलाकातों पर भी जोर दिया जाने लगा है।
इस बीच चुनाव प्रचार में लगे कुछ वरिष्ठ सदस्यों ने चुनाव को जातिगत समीकरणों की ओर मोड़ने को गलत बताया। चैंबर से करीब बीस साल से जुड़े एक सदस्य संजीव अग्रवाल (बांकेबिहारी) ने "न्यूज नजरिया" से कहा कि चैंबर से उद्यमी और व्यापारी जुड़े हुए हैं। इसमें सभी जाति के लोग शामिल हैं। ऐसे में चुनावों को अग्रवाल बनाम माथुर वैश्य का रूप देना सही नहीं है। दोनों ही जातियों के लोग प्रत्याशी की जाति की बजाय योग्यता को देख रहे हैं। 
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