चैम्बर चुनाव: कोषाध्यक्ष पद से एक प्रत्याशी ने लिया नाम वापस, कार्यकारिणी सदस्यों में भी सहमति बनाने के प्रयास तेज, अध्यक्ष पद के लिए एकराय बनाने की मुहिम फिर टली

आगरा, 08 मार्च। नेशनल चैम्बर ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स यूपी आगरा के वार्षिक चुनावों में कोषाध्यक्ष पद के एक प्रत्याशी ने नाम वापस ले लिया है। कार्यकारिणी के 14 ग्रुपों में से कुछ पर आम सहमति बनने का दावा किया गया है और कुछ अन्य पर सहमति के प्रयास जारी हैं। नाम वापसी की अंतिम तिथि सोमवार नौ मार्च शाम तक है। 
इस बीच कुछेक बुजुर्ग पूर्व अध्यक्षों ने एक बार फिर अध्यक्ष पद पर सहमति बनाने की मुहिम शुरू की, लेकिन दो प्रत्याशियों के एकमत होने की संभावना कमजोर मानते हुए इस मुहिम को टाल दिया गया। कुछेक ने अध्यक्ष पद के दोनों प्रत्याशियों को बुलाकर साक्षात्कार लेने का सुझाव दिया, लेकिन कुछ विद्वानों ने उन्हें सलाह दी कि दोनों प्रत्याशियों द्वारा बुजुर्गों को सर्वाधिकार दिए बिना इस प्रकार की कोशिशों के निष्फल होने की आशंका अधिक है। हालांकि कुछेक बुजुर्गों ने आस नहीं छोड़ी है, वे प्रयासरत हैं कि नाम वापसी की सीमा पूरी होने तक कोई बात बन जाए। 
कोषाध्यक्ष पद पर तीन प्रत्याशियों सतीश अग्रवाल, विनय मित्तल और नीरज अग्रवाल ने नामांकन पत्र भरा था। इनमें से नीरज अग्रवाल ने अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया। चुनाव समिति के एक सदस्य ने इसकी पुष्टि की, हालांकि चुनाव समिति के चेयरमैन मनीष अग्रवाल ने कहा कि वे नामांकन वापसी की सीमा पूरी होने के बाद ही आधिकारिक बयान जारी करेंगे।
दावा किया जा रहा है कि एक प्रत्याशी के समर्थन में नीरज अग्रवाल ने यह निर्णय लिया, लेकिन दोनों ने इस पर चुप्पी साधे रखी। दूसरी ओर कोषाध्यक्ष पद के तीसरे प्रत्याशी के समर्थकों में नीरज के नाम वापसी से खुशी का माहौल है। उनका मानना है कि नीरज के मैदान से हटने का लाभ उनके प्रत्याशी को मिल सकता है क्योंकि दोनों का वोट बैंक लगभग समान है और दोनों के मैदान में रहने से एक-दूसरे के वोट कटते।
कोषाध्यक्ष पद के एक प्रत्याशी के लिए उसके "चाचा" द्वारा भी प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि यह "चाचा" खुद भी दूसरे पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। अपनी जीत तय मानकर वह अंदरखाने में भतीजे को भी जिताने को प्रयासरत हैं। "चाचा" की मुश्किल है कि वह दूसरे पैनल में है इसलिए खुलकर "भतीजे" के लिए अपील नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन सूत्रों का दावा है कि व्यक्तिगत तौर पर उनके प्रयास जारी हैं। देखना होगा कि ये प्रयास क्या रंग लाएंगे।
इस बीच चुनावों के रणनीतिकार रविवार को पूरे दिन कार्यकारिणी सदस्यों के लिए 14 ग्रुपों में सहमति बनाने के प्रयास में लगे रहे। इनमें कुछ सफलता भी मिली। माना जा रहा है कि सोमवार को नाम वापसी की सीमा पूरी होने तक कुछ और ग्रुपों में सहमति बनाई जा सकती है। सूत्रों का दावा है कि सहमति बनाने के लिए कहीं प्रलोभन दिए जा रहे हैं तो कहीं स्थिति का भान कराया जा रहा है। कुछेक कार्यकारिणी प्रत्याशियों को परोक्ष रूप से धमकी दिए जाने की भी शिकायतें मिल रही हैं।
हालांकि कुछ वरिष्ठ सदस्यों का मानना है कि कार्यकारिणी सदस्यों के लिए ग्रुपों में सहमति बनाने से इसका असर मतदान पर पड़ सकता है। ग्रुप क्लियर होने पर कार्यकारिणी सदस्य उदासीन हो सकते हैं और इस स्थिति में उनके नजदीकी मतदाताओं की संख्या अन्य पदों पर वोट डालने में कम रुचि दिखा सकती है। लेकिन ग्रुपों को क्लियर कराने में जुटे रणनीतिकारों का मानना है कि इससे मतदाताओं को केवल प्रमुख पदों पर वोट डालने के लिए आकर्षित करने में मदद मिलेगी।
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