दुनिया नए शीत युद्ध की ओर? अमेरिका के बदले तेवर से रूस और चीन पर रणनीति बदलने का दबाव

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नजरिया/अनिल दीक्षित 
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वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित कोई रणनीतिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे वैश्विक शक्ति संतुलन को चुनौती देने वाला कदम है। इस घटना को यदि रूस और चीन के संदर्भ में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि मामला किसी एक देश के शासन परिवर्तन से कहीं आगे निकल चुका है। वास्तव में, यह उस उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जिसमें अमेरिका का वर्चस्व अब निर्विवाद नहीं रह गया है।
वेनेजुएला लंबे समय से रूस और चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा रहा है। रूस ने न केवल वहां सैन्य सहयोग और हथियार आपूर्ति की है, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में भी गहरी साझेदारी विकसित की है। चीन ने वेनेजुएला को भारी ऋण, बुनियादी ढांचे में निवेश और तेल के बदले आर्थिक सहायता देकर अपने दीर्घकालिक हित सुरक्षित किए हैं। ऐसे में अमेरिकी कार्रवाई को मॉस्को और बीजिंग केवल एक क्षेत्रीय हस्तक्षेप के रूप में नहीं, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र में सीधी घुसपैठ के रूप में देख रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति का मूल उद्देश्य हमेशा स्पष्ट रहा है, अमेरिकी प्रभुत्व को पुनः स्थापित करना। चाहें उसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति की कीमत क्यों न चुकानी पड़े। वेनेजुएला की घटना इसी नीति का विस्तार है। यह संदेश दिया गया है कि अमेरिका अब उन देशों को बर्दाश्त नहीं करेगा जो रूस और चीन के साथ मिलकर वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। इस अर्थ में वेनेजुएला केवल एक उदाहरण है, चेतावनी नहीं।
रूस के लिए यह मामला प्रतिष्ठा और सुरक्षा दोनों से जुड़ा है। यदि अमेरिका खुले तौर पर किसी ऐसे देश में सत्ता परिवर्तन करा सकता है जो रूस का रणनीतिक साझेदार रहा हो, तो कल यही मॉडल यूक्रेन, सीरिया या किसी अन्य रूसी हित क्षेत्र में भी दोहराया जा सकता है। यही कारण है कि रूस इस घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर इसे एकतरफा शक्ति प्रयोग बता रहा है। चीन की चिंता अपेक्षाकृत शांत लेकिन कहीं अधिक गहरी है। चीन की विदेश नीति हस्तक्षेप-विरोध और संप्रभुता के सम्मान के सिद्धांत पर आधारित रही है, क्योंकि यही सिद्धांत उसे ताइवान, हांगकांग और शिनजियांग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सुरक्षा प्रदान करते हैं। यदि वेनेज़ुएला जैसे मामलों में शासन परिवर्तन को वैध मान लिया गया, तो चीन को आशंका है कि भविष्य में यही तर्क उसके आंतरिक मामलों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए बीजिंग इस घटनाक्रम को केवल अमेरिकी आक्रामकता नहीं, बल्कि एक खतरनाक मिसाल के रूप में देख रहा है।
इस पूरी स्थिति से यह संकेत मिलता है कि दुनिया एक बार फिर वैचारिक और रणनीतिक खेमों में बंटती जा रही है। एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी हैं, जो ‘लोकतंत्र बनाम तानाशाही’ की भाषा में हस्तक्षेप को जायज़ ठहराते हैं; दूसरी ओर रूस और चीन हैं, जो संप्रभुता और बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात करते हैं। यह विभाजन किसी औपचारिक शीत युद्ध की घोषणा नहीं है, लेकिन उसकी परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से बनती दिखाई दे रही हैं। भारत के लिए यह समीकरण विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। भारत रूस का पारंपरिक रणनीतिक साझेदार है, चीन का पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी है, और अमेरिका का उभरता हुआ सहयोगी भी। ऐसे में वेनेज़ुएला जैसी घटनाएँ भारत के लिए केवल दूर की खबर नहीं हैं, बल्कि उसकी विदेश नीति की संतुलनकारी क्षमता की परीक्षा हैं। भारत न तो अमेरिकी शक्ति-राजनीति का अंध समर्थन कर सकता है और न ही रूस–चीन धुरी में स्वयं को पूरी तरह समाहित कर सकता है।
वेनेजुएला का प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं होगा कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह होगा कि शक्ति का प्रयोग किस हद तक वैध माना जाएगा। यदि रूस और चीन इस अमेरिकी कदम को रोकने या उसका प्रभाव सीमित करने में असफल रहते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ‘ताक़त ही न्याय है’ का सिद्धांत और मजबूत होगा। लेकिन यदि वे सामूहिक प्रतिरोध खड़ा करते हैं, तो दुनिया स्पष्ट रूप से नए शीत युद्ध के युग में प्रवेश कर सकती है। अंततः वेनेजुएला की घटना हमें यह समझने का अवसर देती है कि यह केवल एक देश का संकट नहीं है। यह अमेरिका के वर्चस्व, रूस-चीन की महत्वाकांक्षाओं और वैश्विक व्यवस्था के भविष्य के बीच चल रहे टकराव का प्रतीक है। और इस टकराव का परिणाम आने वाले दशकों की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा।
(लेखक विधि प्रोफेसर एवं विश्लेषक हैं।)
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