’हनुमान अंश,’ पढ़िए मंत्रमुग्ध कर देने वाला चित्रण! रामलीला कमेटी की कार्यकारिणी ने भी देखी फिल्म

आगरा, 08 सितम्बर। रामलीला कमेटी की कार्यकारिणी सोमवार को फिल्म ’हनुमान अंश’ देखकर अभिभूत नजर आई। फिल्म में बाबा नीब करौरी के बचपन और संन्यासी जीवन का चित्रण किया गया है। कोई नामी कलाकार न होने के बावजूद फिल्म पूरी तरह दर्शकों को बांधे रहने में सफल रहती है। फिल्म की कथा, चरित्र, वातावरण शानदार है। लोकेशन प्राकृतिक हैं, संगीत भी कर्णप्रिय है। 
यही कारण है कि शुरुआत में धीमा कारोबार करने वाली इस फिल्म के अब सौ करोड़ रुपये का कारोबार कर लेने की खबरें आ रही हैं। दर्शक बड़ी संख्या में इस फिल्म की तरफ रुख कर रहे हैं।
संजय प्लेस स्थित डॉ रंजना बंसल के अशोका कॉसमॉस मॉल स्थित गोल्ड सिनेमा मल्टीप्लेक्स में रामलीला कमेटी के महामंत्री राजीव अग्रवाल के नेतृत्व में प्रमुख पदाधिकारियों ने सोमवार की सायं फिल्म का अवलोकन किया। बाबा नीब करौरी की साधना और चमत्कारों से भरी फिल्म को सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। सभी ने फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
एक दर्शक ने फिल्म को लेकर अपनी भावपूर्ण प्रतिक्रिया महामंत्री राजीव अग्रवाल को भेजी। "न्यूज नजरिया" इस प्रतिक्रिया को जस का तस प्रकाशित कर रहा है। आप भी इसका रसास्वादन कीजिये--
’हनुमान अंश’
"आखिरकार रिलीज के चौथे सप्ताह हमने ’हनुमान अंश’ देख ही ली। जब इसका ट्रेलर आया था मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। फिर सजेशन में दिखा तो प्ले कर दिया।"
एक क्रांतिकारी जो पंद्रह दिनों से पुलिस से छिपकर भूखे एक कमरे में छिपे हुए हैं। उनके एक साथी उनसे मिलने पहुंचते हैं, उन्हें बताते हैं कि तुम्हारे नाम का शूट एट साइट का ऑर्डर निकला हुआ है, सावधानी रखो। इसके बाद उनके साथी उनसे खाने के लिए कुछ मांगते हैं। जवाब न मिलता देखकर वे खुद ही बर्तन वगैरह खोलकर टटोलने लगते हैं। कहीं कोई अन्न का दाना तक नहीं।
”आपने कितने दिनों से खाना नहीं खाया?” वे उन क्रांतिकारी से प्रश्न करते हैं।
”6 दिन से।" वे झूठ बोलते हैं, उन्होंने पंद्रह दिनों से नहीं खाया हुआ था। घर के बाहर ही एक मंदिर है, उनके साथी कहते हैं कि बाहर मंदिर है, खाने को तो मिल ही जाता वहां से।
किंतु वे नास्तिक व्यक्ति थे, मंदिरों को आडंबर और पाखंड की स्थली मानते थे इसलिए वहां खाना उन्हें स्वीकार्य नहीं।
अचानक दरवाजे पर दस्तक होती है। वे देशी कट्टा निकाल कर दरवाजे पर आते हैं।
"कौन है?"
”सीता राम” बाहर से आवाज आई। दरवाजा खुला और एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े मुस्कुराते हुए खड़े हैं। इसी समय एक धुन गूंजने लगती, कृष्णदास जी का भजन, जो आत्मा में उतर जाता है। कृष्णदास जी, जिनका असल नाम जेफरी केगल था, वे न्यूयॉर्क से थे, जो संयोगवश आध्यात्मिक खोज में भारत आए और नीम करौरी बाबा से मिले और उन्हीं के आश्रम में उन्होंने भजन कीर्तन ध्यान सिखा। मैं उनका यह कीर्तन सालों से सुनता आ रहा हूं, किंतु फिल्म के टीजर और फिल्म के दौरान जब यह पार्श्व में बजता है तब रोम-रोम स्तब्ध हो जाता है। 
”क्या चाहते हो? हमारे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।” उन्होंने कहा।
”अरे बेटा, तुम्हारे यहां मेहमान बाहर से आए हैं, भूखे होंगे। तो सोचा पूड़ी सब्जी खा लेंगे।” वे प्यार से हंसते हुए सिर हिलाकर कहते हैं और पूड़ी सब्जी का दौना थमा देते हैं जिसे क्रांतिकारी के साथी लपक लेते हैं और खाने लगते हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में भूख झलक रही है।
”भूखे तो तुम भी लगते हो, आ जाओ।” कहते हुए बाबा उन्हें बुलाते हैं और पंद्रह दोनों में पूड़ी सब्जी देते हैं। जिस पर वे टूट पड़ते हैं, फिर वे गिनते हैं तो पंद्रह दौने देखकर हैरान होते हैं क्योंकि वे भी पंद्रह दिनों से भूखे होते हैं। बाबाजी उन्हें लद्दाख जाने की सलाह देते हैं। उनके साथी उन्हें बाबाजी को प्रणाम करने को कहते हैं किंतु वे किसी को प्रणाम नहीं करते।
किंतु लद्दाख के लिए निकलते समय वे धन्यवाद करने बाबाजी के पास आते हैं लेकिन उनके मुख से शब्द नहीं निकलते। बाबाजी उन्हें अपना कम्बल ओढ़ा देते हैं।
”वहां बहुत ठंड रहेगी, काम आएगा, और ये लाठी भी रखो।” कहते हुए उनके माथे पर भस्म रगड़ देते हैं। क्रांतिकारी का हृदय परिवर्तित होने लगा है, विचार बदलने लगे हैं, वह भी भारी भरकम प्रवचन और शब्दावली के बिना। यही भाव हम सबमें उतरने लगता है और फिल्म शुरू होती है। बाबाजी के बचपन से लेकर युवावस्था तक की कहानी इस प्रकार सहजता से प्रस्तुत की जाती है कि हम मंत्रमुग्ध और सम्मोहित होकर उसका हिस्सा बन जाते हैं। 
इतने कम बजट की फिल्म में ईमानदारी से किया गया प्रयास उसे कितना जीवंत बना देता है यह इसी से पता चलता है कि हम ढाई घंटे तक फिल्म के समयकाल में घूमते हुए खुद को भी उसी समयकाल में विचरता हुआ महसूस करने लगते हैं। मुझे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं रहा, प्रतीत हुआ जैसे मैं उन्हीं गांवों में उन्हीं लोगों के बीच रह रहा हूं। 
फिल्म समाप्त होने के बाद बहुत संतुष्टि मिलती प्रतीत होती है। फिल्म और उसका वातावरण दिमाग में घूमता रहता है जो अब काफी समय तक जस का तस बना रहेगा। फिल्म का हर पहलू शानदार है, कथा, चरित्र, वातावरण। लोकेशन असल हैं, प्राकृतिक हैं, जो कदापि बनावटी नहीं प्रतीत होते। संगीत इसका बहुत मजबूत पक्ष है, जय हनुमान, मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, शिवाय नमः, पार्वती और शंकर वाले गीत ध्यान में रह जाते हैं। मधुर, सरस और मंत्रमुग्ध कर देने वाला सम्मोहन है इन गीतों में जिन्हें आप फिल्म देखने के बाद यूट्यूब पर सर्च करके अवश्य सुनेंगे और फिल्म दूसरों को रिकमेंड भी जरूर करेंगे। डायरेक्टर की यह पहली ही फिल्म है, लीड कैरेक्टर की यह पहली फिल्म है, लो बजट और कोई प्रमोशन या pr नहीं, कोई तामझाम नहीं। फिर भी दर्शकों के हृदय में अपना स्थान बनाते हुए बड़ी सी बड़ी फिल्मों को टक्कर दे रही है।
देखिए, सुनिए, महसूस कीजिए, खो जाइए।
सीताराम! जय हनुमान!
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