एक और जीएसटी घोटाला, संजय प्लेस के पते पर नहीं मिली फर्म, 79 लाख रुपये की कर चोरी

आगरा, 17 जून। फर्जी जीएसटी पंजीकरण के जरिए सरकारी राजस्व को करोड़ों का चूना लगाने वाला एक और बड़ा घोटाला सामने आया है। राज्य कर विभाग की जांच में खुलासा हुआ कि एक कागजी फर्म बनाकर करीब 79 लाख रुपये की कर चोरी की गई। विभाग की शिकायत पर थाना लोहामंडी में मुकदमा दर्ज किया गया है। 
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी ने संजय प्लेस स्थित एक पते पर ‘धर्मेंद्र ट्रेडर्स’ नाम से जीएसटी पंजीकरण कराया। नियमित सत्यापन के दौरान जब राज्य कर विभाग की टीम मौके पर पहुंची तो वहां फर्म का कोई अस्तित्व नहीं मिला। न तो कार्यालय मिला और न ही किसी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि दिखाई दी। आसपास के दुकानदारों और स्थानीय लोगों ने भी ऐसी किसी फर्म या उसके संचालक के बारे में जानकारी होने से इनकार कर दिया। पंजीकरण के दौरान जमा कराए गए दस्तावेजों की बारीकी से जांच की गई तो फर्म के नाम पर प्रस्तुत बिजली बिल संदिग्ध पाया गया। रिकॉर्ड मिलान में पता चला कि बिल में दर्ज उपभोक्ता संख्या किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर पंजीकृत है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि जीएसटी पंजीकरण हासिल करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
अधिकारियों ने फर्म से जुड़े मोबाइल नंबरों की पड़ताल की। एक नंबर बंद मिला, जबकि दूसरा नंबर किसी ऐसे व्यक्ति का निकला जिसका फर्म से कोई संबंध नहीं था। राज्य कर विभाग के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में धर्मेंद्र ट्रेडर्स ने लगभग 4.37 करोड़ रुपये का कारोबार दर्शाया। इस कारोबार पर करीब 78.81 लाख रुपये का कर बनता था। आरोप है कि कर जमा करने के बजाय संदिग्ध और फर्जी फर्मों से बोगस इनपुट टैक्स क्रेडिट प्राप्त कर देनदारी का समायोजन कर लिया गया।
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अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान माल की खरीद-बिक्री, परिवहन अथवा वास्तविक व्यापार से जुड़े कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले। केवल ई-वे बिल और इनवॉइस के जरिए कागजी लेन-देन दर्शाकर कर लाभ लेने की कोशिश की गई।
विभाग ने आरोपी को कई बार नोटिस और समन जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। लेकिन न तो कोई जवाब दिया गया और न ही कोई दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। विभाग के समक्ष कोई प्रतिनिधि भी उपस्थित नहीं हुआ। लगातार अनुपस्थिति और दस्तावेजी खामियों के चलते फर्म का जीएसटी पंजीकरण निरस्त कर दिया गया।
मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस और कर विभाग अब इस पूरे फर्जीवाड़े के पीछे सक्रिय नेटवर्क की तलाश में जुटे हैं। जांच एजेंसियां बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजेक्शन, आईपी एड्रेस, ई-मेल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी साक्ष्यों को खंगाल रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह मामला किसी संगठित गिरोह या बड़े फर्जी जीएसटी नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है, जो कागजी कंपनियां बनाकर बोगस इनपुट टैक्स क्रेडिट का खेल खेल रहा है। इसी संभावना को देखते हुए अन्य संदिग्ध फर्मों की भी जांच शुरू कर दी गई है।
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