स्पाइन एवं ब्रेन स्ट्रोक के उपचार के लिए नवीनतम तकनीक, ज्ञान और अनुभव को विशेषज्ञों ने किया साझा

आगरा, 17 मई। वर्तमान समय में बदलती जीवन शैली, तनाव, अनियमित खानपान, मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं अन्य कारणों से स्ट्रोक, स्पाइन रोग एवं न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की घटनाओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। इन जटिल बीमारियों के आधुनिक एवं प्रभावी उपचार हेतु विशेषज्ञों के बीच नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी का आदान प्रदान करने के उद्देश्य से यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी एवं न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा रविवार को फतेहाबाद रोड स्थित एक होटल में 'भविष्य की ओर अग्रसर' थीम पर मिड टर्म सीएमई- 2026 का आयोजन किया गया।
 सेमिनार में आगरा, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़, मथुरा, नोएडा, झाँसी, सैंफई, लखनऊ, प्रयागराज, फरीदाबाद, गाजियाबाद और दिल्ली सहित देश भर से आए 130 से अधिक न्यूरोसर्जन, न्यूरोलॉजिस्ट एवं स्पाइन विशेषज्ञों ने भाग लिया। विभिन्न वैज्ञानिक सत्रों में ब्रेन स्ट्रोक (लकवा) और रीढ़ की हड्डी से संबंधित विभिन्न बीमारियों के निदान के लिए लेटेस्ट दवाइयों और सर्जिकल तकनीक पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान के साथ पैनल चर्चा की गई। 
मुख्य अतिथि न्यूरो सर्जन डॉ. आरसी मिश्रा, यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, सचिव डॉ. अरविंद कनकने, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल, सचिव डॉ. विनय अग्रवाल, सदस्य डॉ. आलोक अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता और डॉ. मयंक अग्रवाल ने संयुक्त रूप से सेमिनार का शुभारंभ किया। 
बदलिए अपना आहार और व्यवहार, अन्यथा बन सकते हैं पक्षाघात का शिकार: डॉ. पीके माहेश्वरी
एसएन मेडिकल कॉलेज में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष डॉ. पीके माहेश्वरी ने बायोलॉजिकल क्लॉक और ब्रेन अटैक के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि देर से सोना, देर से उठना, सूर्यास्त के बाद देर रात भोजन करना, पैदल न चलना, शारीरिक श्रम न करना आदि खराब आदतों के कारण ज्यादातर लोगों की जैविक घड़ी खराब हो गई है। इसी कारण वह अनिद्रा, तनाव, अवसाद, बीपी और स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि हम अपना आहार और व्यवहार बदलें।
लकवे के मरीज में शुरू के 3 घंटे इलाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण
'स्ट्रोक में थ्रंबोलाइसिस' विषय पर महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झाँसी में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा यूपी- यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के सचिव डॉ. अरविंद कनकने ने बताया कि लकवे के मरीजों में इंजेक्शन के थ्रू नसों में थ्रंबोलिसिस दवा द्वारा रक्त के थक्के को घोलकर रक्त प्रवाह बहाल किया जाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं को बचाया जाता है।
उन्होंने बताया कि लक्षण शुरू होने के साढे चार घंटे में इंट्राविनस थ्रंबोलिसिस इंजेक्शन लगवाना चाहिए। समय पर इलाज होने से लकवे के स्थाई प्रभाव और विकलांगता को कम किया जा सकता है।
कैंसर न होते हुए भी कैंसर की तरह व्यवहार करता है यह ट्यूमर
न्यूरो सर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने 'सीएनएस हिमेंजिओब्लास्टोमाज के प्रबंधन' पर विचार रखते हुए कहा कि यह ऐसा खतरनाक ट्यूमर है जो कैंसर ना होते हुए भी कैंसर की तरह व्यवहार करता है। यह ऐसी जगह पाया जाता है जहाँ से इंसान की साँस चलती है। इसकी स्थिति देखकर सर्जन के भी पसीने छूट जाते हैं। ट्यूमर का आकार, स्थान और वृद्धि दर के साथ रोगी की समग्र स्वास्थ्य स्थिति देखकर सर्जरी या रेडियो सर्जरी द्वारा इसका प्रबंधन किया जाता है।
अब मुँह में चीरा देकर ऑपरेशन नहीं करना पड़ता, खतरा हुआ कम
'एंडोनेजल एंडोस्कोपिक ओडोन्टोएक्टोमी' विषय पर संजय गाँधी पीजीआई के विभागाध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, लखनऊ ने बताया कि खोपड़ी और रीड की हड्डी जहाँ जुड़ती है, वहाँ अक्सर कुछ लोगों की हड्डी खिसक जाती है। ऐसे मरीज के लिए पहले पूरा मुँह खोलकर मुँह में चीरा देकर एक ऑपरेशन किया जाता था जो बहुत रिस्की होता था। इसमें मरीज को बहुत तकलीफ भी होती थी क्योंकि ऑपरेशन मुँह के जरिए किया जाता था। अब जो नई एंडोस्कोपिक तकनीक आई है, उसमें नाक के जरिए एंडोस्कोपी का उपयोग करके छोटा सा चीरा लगाकर दूरबीन द्वारा ऑपरेशन कर दिया जाता है। 
सर्वाइकल स्पाइन की सर्जरी के लिए पढ़ा शोध पत्र
आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने सर्वाइकल स्पाइन की सर्जरी के क्षेत्र में नवीनतम तकनीकों के बारे में अपनी शोध पत्र को प्रस्तुत करते हुए बताया कि ऑपरेशन की नवीनतम विधियों द्वारा अब हाथ पैर के मारे जाने का खतरा कम हो गया है। मरीज को दर्द से आराम मिलता है। मरीज को शीघ्र ही उठाया बैठाया जा सकता है। गर्दन की हड्डी की स्लिप डिस्क का इलाज भी अब नवीनतम तकनीक से बहुत आसान हो गया है।
रीढ़ की हड्डी में टीबी पर किया गया पैनल डिस्कशन
डॉ. अरविंद कुमार अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. सुयश सिंह, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. यशपाल बुंदेला और डॉ. संतोष कुमार के एक पैनल में रीढ़ की हड्डी में टीवी पर विचार विमर्श करते हुए बताया कि यह बीमारी वैसे तो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है लेकिन युवाओं में ज्यादा देखने में आ रही है। अगर बुखार हो, कमर दर्द हो, चलने में दिक्कत हो, पैरों में झनझनाहट हो, रीढ़ की हड्डी में किसी नस पर ज्यादा दबाव महसूस करें, पैरों में कमजोरी महसूस करें तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। जांच करवाएँ और इलाज शुरू करें। अपना खान-पान अच्छा रखें। अगर कोई व्यक्ति छाती की टीबी का मरीज है तो उससे बात करते समय सावधानी बरतें, मास्क लगाएँ।
ब्रेन स्ट्रोक पर किए गए पैनल डिस्कशन में डॉ. विनय अग्रवाल, डॉ. मयंक अग्रवाल, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ के डॉ. बीके ओझा, डॉ. विकास बंसल, मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डॉ. विवेक कुमार और डॉ. अंकुर अग्रवाल ने विचार विमर्श करते हुए कहा कि ब्रेन हेमरेज में सबसे मुख्य है रक्तचाप पर नियंत्रण करना। साथ ही जिनको दिल की बीमारी है, उनके ब्रेन स्ट्रोक की रोकथाम में क्लॉट बस्टर की भूमिका महत्वपूर्ण है। 
डॉ. विनय अग्रवाल ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि हृदय रोगियों में लकवे की घटनाएँ ज्यादा होती हैं। ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने से ब्रेन हेमरेज की बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है। न्यूरोसर्जन डॉ. मयंक अग्रवाल ने कहा कि स्पाइन के पेशेंटस को मालिश करवाना, नसों को सुतवाते रहना, देसी इलाज करना या झाड़ फूंक करवाना गंभीर रूप से नुकसानदायक होता है।  
इसके अलावा अपोलो हॉस्पिटल, लखनऊ के विभागाध्यक्ष डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव, डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव, डॉ. अंकुर बजाज, लखनऊ, डॉ. दीपक कुमार सिंह, लखनऊ, डॉ. अनंत मेहरोत्रा, लखनऊ, डॉ. अमित श्रीवास्तव, नोएडा, केजी मेडिकल विश्वविद्यालय, लखनऊ के भूतपूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अतुल अग्रवाल, मैक्स हॉस्पिटल, दिल्ली के डॉ. सुमित सिन्हा ने भी अपने अनुभवों को साझा किया।
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