सड़क दुर्घटना पीड़ितों को बड़ी राहत संभव!! बढ़ सकती है कैशलेस इलाज की सीमा
आगरा, 09 अप्रैल। वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने एक विज्ञप्ति में जानकारी दी कि गुरुवार को नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना पीड़ितों के कैशलेस इलाज से जुड़े अहम मामले की सुनवाई की। फ़िलहाल किसी भी सड़क दुर्घटना पीड़ित को अधिकतम ₹1,50,000 और सात दिन तक का ही कैशलेस इलाज मिलता है, लेकिन अब इस सीमा को बढ़ाए जाने की उम्मीद जग गई है।
विज्ञप्ति के अनुसार, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.बी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने छह अप्रैल को सौंपी गई समिति की रिपोर्ट पर विचार किया। रिपोर्ट में कहा गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय इस बात की निगरानी करे कि क्या ₹1,50,000 या सात दिन की सीमा में पीड़ितों का सही इलाज हो पा रहा है या नहीं।
अधिवक्ता केसी जैन ने कोर्ट के समक्ष तर्क रखते हुए कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 162(1) के तहत बीमा कंपनियों को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के इलाज के लिए एक अलग योजना बनानी चाहिए। उन्होंने दलील दी कि जब किसी दुर्घटनाग्रस्त वाहन का थर्ड पार्टी बीमा है और बीमा कंपनी की देनदारी की कोई मौद्रिक सीमा नहीं होती, तो इलाज पर ₹1,50,000 या सात दिन की कैप क्यों लगाई जाए? जैन ने यह भी कहा कि आखिरकार मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) का अवार्ड मिलने पर बीमा कंपनी ही सारा खर्च चुकाती है तो फिर घायल को समय पर इलाज क्यों न मिले?
कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए न्याय मित्र गौरव अग्रवाल सड़क मंत्रालय व समिति को कहा कि वह इस पर विचार करके अगली सुनवाई में अपना मत रखे।समिति ने खुद स्वीकार किया कि 98% पीड़ितों का इलाज ₹60,000 के भीतर हो जाता है। लेकिन एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाएं अक्सर बहुत गंभीर होती हैं और ऐसे में मौजूदा सीमा नाकाफ़ी है। इसलिए समिति ने भी सीमा बढ़ाने की उम्मीद जताई।
इसी सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2019 से 2021 के बीच के मोटर व्हीकल नियम उल्लंघन के मामलों को बंद करने के लिए पास किए गए कानून का मसला भी सामने आया। यूपी सरकार के वकील ने बताया कि इस संबंध में जल्द ही आदेश जारी किया जाएगा और मंत्रिपरिषद ने इसे मंज़ूरी दे दी है। हालांकि, जो मामले गैर-शमनीय अपराधों से जुड़े हैं या जहाँ बार-बार उल्लंघन हुए हैं, वे मामले दोबारा जीवित किए जाएंगे और न्यायालय में मुक़दमे पुनः चलेंगे।
अधिवक्ता जैन ने इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बिना इस तरह का कानून बनाना अवैध है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के मामले में देश में कई वर्षों से पहले स्थान पर है। ऐसे में ट्रैफ़िक नियमों के डर का कारक खत्म करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
अधिवक्ता जैन द्वारा दाखिल अन्य तीन याचिकाएं भी आगामी 12 मई को सूचीबद्ध की जाएंगी। उस दिन कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाने पर भी अहम फ़ैसला आने की संभावना है।
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