जब कानून कागज़ पर रहे और सड़क पर खून बहे

नजरिया/डॉ. संजय चतुर्वेदी
एक पल के लिए सोचिए। आप रात को किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रहे हैं। अचानक सामने एक बड़ा ट्रक बिना लाइट के सड़क के बीचोंबीच खड़ा है। बचने का मौका नहीं मिलता। हादसा हो जाता है। एम्बुलेंस के लिए फोन करते हैं, कोई जल्दी नहीं आती। घंटों इंतज़ार। और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह कोई कल्पना नहीं है। यह देश की सड़कों पर हर रोज़ घटने वाली सच्चाई है ।
साल 2023 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में एक लाख बहत्तर हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए। यानी हर दिन चार सौ चौहत्तर लोग, हर घंटे उन्नीस ज़िंदगियाँ। इनमें से पैंतीस हज़ार से ज़्यादा पैदल चलने वाले थे— वे लोग जो बस सड़क पार कर रहे थे या फुटपाथ पर चल रहे थे। चौवन हज़ार से ज़्यादा दुपहिया वाहन सवार केवल इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना था। सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने आदेश में कहा है कि ये मौतें टाली जा सकती थीं।
इन्हीं हालात को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इसी 13 अप्रैल को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों का केवल दो प्रतिशत हैं, लेकिन इन पर सड़क दुर्घटना में होने वाली कुल मौतों का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा है। इसकी वजह है हाईवे पर बेतरतीब खड़े ट्रक, अवैध ढाबे और दुकानें, टूटी या अनुपस्थित लाइटें, दुर्घटनास्थल पर समय पर न पहुँचने वाली एम्बुलेंस और ढीली प्रशासनिक निगरानी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार हमारे संविधान की गारंटी है और सुरक्षित सड़क उसी गारंटी का एक अनिवार्य हिस्सा है। अदालत के शब्दों में, कोई भी प्रशासनिक या वित्तीय बाधा मानव जीवन की पवित्रता से ऊपर नहीं हो सकती।
इस आदेश में सरकार और उसकी एजेंसियों को स्पष्ट समय सीमा में अनेक काम करने को कहा गया है । पंद्रह दिन के भीतर हर उस जिले में एक जिला राजमार्ग सुरक्षा टास्क फोर्स बनानी होगी जहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग गुज़रता है। तीस दिन में हाईवे किनारे दिए गए अवैध लाइसेंस और परमिट की समीक्षा करनी होगी। पैंतालीस दिन में दुर्घटना-प्रवण स्थानों की पूरी सूची सार्वजनिक करनी होगी। साठ दिन में राजमार्ग के आरक्षित क्षेत्र में बने सभी अवैध ढाबे और दुकानें हटानी होंगी। साठ दिन में हर 75 किलोमीटर पर एम्बुलेंस और रिकवरी क्रेन तैनात करनी होगी और 75 दिन में सीधे सुप्रीम कोर्ट को जिलेवार अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी।
लेकिन यहीं रुककर एक ज़रूरी सवाल पूछना चाहिए। क्या यह पहला कानून है? क्या यह पहला आदेश है? क्या यह पहली समिति है? नहीं।
वर्ष 2017 में सरकार ने देश के हर जिले में जिला सड़क सुरक्षा समिति गठित की थी, जिसमें कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, लोक निर्माण विभाग और NHAI के अधिकारी शामिल होने थे, और हर तीन महीने में बैठक होनी थी। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की एक निगरानी समिति ने सभी राज्यों को आदेश दिया कि सड़क दुर्घटना के कारण होने वाली मौतें हर साल कम से कम दस प्रतिशत कम करो, एम्बुलेंस का नक्शा बनाओ, हेलमेट के लिए वार्षिक लक्ष्य तय करो, और हाईवे पेट्रोलिंग सुनिश्चित करो। वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे की अध्यक्षता में बनी सुप्रीम कोर्ट समिति ने जिला समितियों को और मजबूत करते हुए पाक्षिक बैठकें अनिवार्य कीं, बैठकों के मिनट्स अड़तालीस घंटों के भीतर वेबसाइट पर डालने के निर्देश दिए, और आपातकालीन चिकित्सा योजना तैयार करने को कहा। अक्टूबर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया जिसमें फुटपाथ ठीक करने, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाने और हेलमेट को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए और अब अप्रैल 2026 में एक और आदेश।
हर आदेश इसलिए आया क्योंकि पिछला लागू नहीं हुआ।
यह तथ्य हमें उस केंद्रीय प्रश्न तक ले जाता है जिससे हम बार-बार आँखें चुराते हैं। समस्या कानून में नहीं है। समस्या कानून को लागू करने की इच्छाशक्ति में है। हमारे पास मोटर वाहन अधिनियम है, उसका संशोधित रूप है, भारतीय सड़क कांग्रेस के विस्तृत दिशा-6निर्देश हैं, राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति है, सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेश हैं, जिला समितियाँ हैं, निगरानी समितियाँ हैं। लेकिन सड़क पर आज भी अवैध पार्किंग है, ढाबे हाईवे के किनारे अनाधिकृत रूप से चल रहे हैं, दुर्घटना-प्रवण स्थान वर्षों से चिन्हित हैं पर ठीक नहीं हुए, आपातकालीन नंबर 1033, 108 और 112 अलग-अलग काम कर रहे हैं और उनमें कोई समन्वय नहीं है, और दुर्घटना का आँकड़ा अधूरा दर्ज होता है जो नीतिगत सुधार के किसी काम नहीं आता ।
इस बार सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग रास्ता अपनाया है। उसने केवल निर्देश नहीं दिए, बल्कि अधिकारियों को नाम लेकर जवाबदेह बनाया है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की संयुक्त जिम्मेदारी तय की गई है। सीधे न्यायालय में अनुपालन रिपोर्ट माँगी गई है। अनुपालन न होने पर न्यायालय की अवमानना की संभावना खुली हुई है। यह इसलिए हुआ क्योंकि अदालत समझ चुकी है कि आदेश देना पर्याप्त नहीं है, उसे करवाना भी ज़रूरी है।
और यहाँ आम नागरिक की भी एक भूमिका है। अगर आपके इलाके में हाईवे के किनारे कोई अवैध ढाबा या दुकान है तो NHAI की शिकायत पोर्टल राजमार्ग यात्रा पर या 1033 पर सूचना दें। अगर सड़क पर कोई दुर्घटना हो और आप वहाँ हों तो घायल की मदद करें, क्योंकि कानून आपकी रक्षा करता है। अगर कोई बिना हेलमेट के चला रहा है तो समझाएँ। अपने जिले की सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों की जानकारी माँगें क्योंकि यह आपका अधिकार है।
हर बार जब कोई सड़क हादसे में जाता है तो एक पूरा परिवार टूट जाता है। एक बच्चे का पिता चला जाता है। एक बूढ़े माँ-बाप का सहारा छिन जाता है। एक घर का दीपक बुझ जाता है। और यह सब टाला जा सकता था।
कानून है। अदालत का आदेश है। समितियाँ हैं। जागरूकता आ रही है। बस एक चीज़ चाहिए कि यह सब कागज़ों से उठकर सड़क पर उतरें। क्योंकि हर वह मौत जो रोकी जा सकती थी, एक ही सवाल छोड़ जाती है — हम कब जागेंगे ?
(- लेखक वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ और जिला सड़क सुरक्षा समिति, आगरा के पूर्व सदस्य हैं।)
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