रामकथा में मुरारी बापू बोले- 23 वर्ष पहले आगरा में ‘मानस तेजो महल’ गाया था
आगरा, 20 सितंबर। करुणानिधान परिवार द्वारा फतेहाबाद रोड पर स्थित एक मैदान पर आयोजित मोरारी बापू की रामकथा के छठवें दिन राम जन्म प्रसंग सुनते ही पंडाल भक्ति और उल्लास से भर उठा।
बापू ने ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला कौशल्या हितकारी’ का भावपूर्ण वर्णन किया। जैसे ही राम जन्म का प्रसंग आया, ‘हाथी दियो घोड़ा दियो, जय रघुवर लाल की’ के जयघोष गूंजे, ढोल बजे और बधाइयां लुटीं।
कथा का शुभारंभ रघुनंदन वंदन से करते हुए बापू ने कहा कि आगरा में आग भी है और राग भी। आग यानी जिज्ञासा और राग यानी आकर्षण। 23 वर्ष पहले उन्होंने यहां ‘मानस तेजो महल’ गाया था, आज ‘मानस ऋषि पंचमी’ कह रहे हैं। उस समय भी उनका यही विचार था और आज भी है कि ताजमहल से पहले अपने भीतर के ‘तेजो महल’ को देखना चाहिए।
कथा अधिकारी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिसमें धैर्य, भजन और बुद्धिपूर्वक सुनने की क्षमता हो, वही अधिकारी है। कथा ऐसी होनी चाहिए जो दशा बदल दे, दिशा नहीं।
‘बड़े भाग मनुष्य तनु पावा’ का स्मरण कराते हुए कहा कि सफलता पर घमंड न करें, सब ईश्वर कृपा से होता है। गुरु कृपा को सिम कार्ड से जोड़ते हुए कहा कि गुरु भीतर ऐसा सिम डालते हैं जिससे सीमित से असीम की यात्रा शुरू होती है। परिवार में राज नहीं, वैराग्य और त्याग की भावना होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं कंठी देने वाला नहीं, कंठ में बैठने वाला साधु हूं।
बापू ने कहा कि भक्ति गंगा है जिसमें ध्रुव, प्रह्लाद और हनुमान नहाए। साधु के पंचशील- धर्मशीलता, कर्मशीलता, करुणा, बालशीलता और प्रेमशीलता की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि रामकथा की ताली बजते ही संशय मिट जाते हैं। राम जन्म केवल ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, भीतर ज्ञान, भक्ति और करुणा के प्रकट होने का उत्सव है।
_________________________________________

Post a Comment
0 Comments