जेन जी !! ये क्या बवाल है? भारत को सोशल मीडिया के चश्मे से मत देखिए

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लेखक- बृज खंडेलवाल 
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जंतर मंतर पर तिलचट्टों के आंदोलन के बाद, आजकल  कोई न कोई विशेषज्ञ यह फ़रमान सुना देता है कि "जेन ज़ेड" यानी आज की युवा पीढ़ी काम से जी चुराती है, मोबाइल से चिपकी रहती है, पाँच मिनट भी ध्यान नहीं लगा सकती और इंस्टाग्राम के बिना उसकी दुनिया सूनी है। 
टीवी चैनलों पर बहस होती है, अख़बार सुर्खियाँ बनाते हैं और सोशल मीडिया वाले इसमें मिर्च-मसाला डाल देते हैं। देखते ही देखते बात हवा बन जाती है। लेकिन  "आधी-अधूरी जानकारी सबसे बड़ा धोखा होती है।"
असल सवाल यह है कि क्या यह तस्वीर पूरे भारत की है? बिल्कुल नहीं।
भारत कोई एक रंग की चादर नहीं है। बेंगलुरु के आईटी पार्क, मुंबई के स्टार्टअप और दिल्ली के कॉफी कैफ़े ही भारत नहीं हैं। असली भारत तो उन लाखों गाँवों में बसता है जहाँ सुबह सूरज निकलने से पहले ही युवा खेतों की राह पकड़ लेते हैं। कोई भैंस का दूध निकाल रहा है, कोई नहर से पानी ला रहा है, कोई कोचिंग जाने के लिए बस पकड़ रहा है और कोई परिवार की रोज़ी-रोटी में हाथ बँटा रहा है।
आगरा और ब्रज क्षेत्र में सुबह-सुबह गाँवों से साइकिल और बसों में बैठकर लड़के-लड़कियाँ शहर की कोचिंग में पहुँचते हैं। लाइब्रेरी में घंटों बैठकर पढ़ाई करते हैं। उनके हाथ में मोबाइल फोन से ज़्यादा किताबें और फोटो कॉपी किए नोट्स दिखाई देते हैं। उनकी सबसे बड़ी परेशानी इंस्टाग्राम नहीं, बल्कि, महँगी कोचिंग और नौकरी की चिंता है। फिरोजाबाद का युवा राकेश कहता है, जिसके पाँव में बिवाई न फटी हो, वह दूसरे का दर्द क्या जाने।
पश्चिमी देशों में "बेबी बूमर", "मिलेनियल", "जेन ज़ेड" जैसे नाम शायद उनकी परिस्थितियों के हिसाब से ठीक हों। लेकिन भारत में इन लेबलों को आँख मूँदकर लागू करना मूर्खता है। ओडिशा के आदिवासी गाँव का किशोर, लद्दाख का चरवाहा, आगरा की नर्सिंग छात्रा और हैदराबाद का सॉफ्टवेयर इंजीनियर एक ही उम्र के हो सकते हैं, मगर उनकी दुनिया, उनकी मुश्किलें और उनके सपने बिल्कुल अलग हैं। सबको एक ही तराज़ू में तौलना नाइंसाफ़ी है।
कहा जाता है कि जेन ज़ेड का ध्यान पाँच मिनट से ज़्यादा नहीं टिकता। अगर ऐसा है तो फिर लाखों छात्र रोज़ दस-दस घंटे बैठकर नीट, जेईई, यूपीएससी, एसएससी और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कैसे कर रहे हैं? आगरा की कोचिंग गलियों में सुबह से रात तक भीड़ लगी रहती है। हर साल लाखों नौजवान सरकारी नौकरियों और अग्निवीर भर्ती के लिए आवेदन करते हैं। क्या यह मेहनत से भागने वाली पीढ़ी की पहचान है? हरगिज़ नहीं।
सच्चाई यह है कि देश का बड़ा हिस्सा आज भी रोज़मर्रा की जद्दोजहद में उलझा हुआ है। किसी को घर चलाना है, किसी को बहन की पढ़ाई करानी है, किसी को बूढ़े माँ-बाप का सहारा बनना है। खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है, लेकिन जिनके सिर पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ हो, वे हवा में महल नहीं बनाते।
हाल के कुछ विरोध-प्रदर्शनों या सोशल मीडिया पर हुई बदतमीज़ी को पूरे देश के युवाओं का चेहरा बना देना भी ठीक नहीं। कुछ लोगों की हरकतों को पूरे समाज पर थोपना एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है वाली सोच है। मीडिया अक्सर चंद घटनाओं को इतना उछाल देता है कि लगता है जैसे पूरा देश वैसा ही हो गया हो। हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है।
मानसिक स्वास्थ्य और काम-ज़िंदगी के संतुलन पर बात होना अच्छी बात है। किसी को भी अपनी सेहत की क़ीमत पर काम नहीं करना चाहिए। लेकिन यह कहना कि हर युवा नौकरी छोड़कर इन्फ्लुएंसर बनना चाहता है, सरासर ग़लत है। किसान का बेटा आज भी सरकारी नौकरी का सपना देख रहा है। मज़दूर की बेटी नर्स बनना चाहती है। छोटे शहर का नौजवान डेयरी, दुकान या छोटा कारोबार शुरू करके अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है। उसकी चाहत शोहरत नहीं, बल्कि इज़्ज़त और स्थिर ज़िंदगी है।
हर कुछ साल बाद नई पीढ़ी का नया नाम आ जाता है। कभी बेबी बूमर, फिर जनरेशन एक्स, उसके बाद मिलेनियल और अब जेन ज़ेड। कल कोई और नाम आ जाएगा। लेकिन इंसान की पहचान उसके जन्म वर्ष से नहीं, बल्कि उसके किरदार, मेहनत और उसूलों से होती है। नाम बदलने से हक़ीक़त नहीं बदलती।
भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता है। यहाँ का युवा कंप्यूटर भी चलाता है और हल भी। कोई वैज्ञानिक बनने का सपना देख रहा है, तो कोई फौज में भर्ती होना चाहता है। कोई रेलवे में अप्रेंटिस है, कोई छोटे शहर में अपना कारोबार खड़ा कर रहा है। कोई बूढ़े माँ-बाप की सेवा करते हुए पढ़ाई कर रहा है, तो कोई सीमित साधनों में नया रास्ता तलाश रहा है। यही असली भारत है।
जेन ज़ेड का शोर टीवी स्टूडियो में अच्छा लग सकता है। सोशल मीडिया पर इससे क्लिक भी मिल सकते हैं। मगर इससे भारत की तस्वीर पूरी नहीं बनती। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं, लेकिन ज़मीन पर उतरकर देखने से असलियत समझ आती है।
भारत के नौजवान किसी विदेशी लेबल के मोहताज नहीं हैं। वे मेहनती हैं, जुझारू हैं और अपने परिवार का भविष्य बदलने का जज़्बा रखते हैं। उनकी कहानी किसी वायरल रील में नहीं, बल्कि खेतों, स्कूलों, अस्पतालों, कारखानों, कोचिंग संस्थानों और छोटे-छोटे शहरों की गलियों में हर रोज़ लिखी जा रही है। यही भारत की असली तस्वीर है, और यही उसके उज्ज्वल कल की सबसे बड़ी उम्मीद।
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