एलआईसी को उपभोक्ता आयोग से राहत, 27 लाख के सात संदिग्ध जीवन बीमा दावे खारिज
आगरा, 31 जुलाई। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के खिलाफ दायर 27 लाख रुपये के सात जीवन बीमा दावों को खारिज कर दिया है। आयोग के अध्यक्ष सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि बीमा अनुबंध परम सद्भाव के सिद्धांत पर आधारित होते हैं और तथ्यों को छिपाना उपभोक्ता अधिकारों के तहत संरक्षण योग्य नहीं है।
प्रकरण के अनुसार, परिवादिनी लक्ष्मी ने अपने चाचा राज बहादुर की 12 दिसंबर, 2017 को छत से गिरकर हुई मृत्यु के बाद एलआईसी की विभिन्न शाखाओं से ली गई सात अलग-अलग पॉलिसियों के तहत दावा पेश किया था।
एलआईसी ने इन दावों को 26 मार्च, 2019 को अस्वीकार कर दिया था। इसके बावजूद परिवादिनी ने 16 अगस्त, 2024 को आयोग के समक्ष परिवाद दायर किया। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 69 के तहत परिवाद दाखिल करने की समय सीमा दो वर्ष निर्धारित है। इस मामले में तीन वर्ष चार माह का विलंब हुआ, जिसका परिवादिनी की ओर से कोई युक्तियुक्त और विधिक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया, अतः यह परिवाद विधिक रूप से कालबाधित है।
आयोग ने सुनवाई के दौरान दस्तावेजों के आधार पर पाया कि बीमाधारक ने बीमा कानून संशोधन अधिनियम 2015 की धारा 45 का स्पष्ट उल्लंघन किया है।
बीमाधारक ने नया प्रस्ताव फॉर्म भरते समय अपनी पूर्व पॉलिसियों का विवरण छिपाया था, जो धोखाधड़ी का संकेत है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा बेन नरेशभाई राठौड़ (2019) मामले की नजीर का हवाला दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के अनुसार, पूर्ण प्रकटीकरण का कर्तव्य यह अपेक्षा करता है कि कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी, जो बीमाकर्ता के हित की हो, उसे न तो छोड़ा जाए और न ही छिपाया जाए।
दावे को संदिग्ध मानने का एक अन्य प्रमुख आधार मृत्यु की परिस्थितियां और नॉमिनी के रिश्ते में पाई गई भारी विसंगति रही।
आयोग ने इस बात को गंभीरता से लिया कि छत से गिरकर मृत्यु होना एक अस्वाभाविक घटना है। ऐसी अस्वाभाविक मृत्यु के मामलों में पुलिस पंचनामा और पोस्टमार्टम जैसी विधिक औपचारिकताएं अनिवार्य होती हैं, लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं कराया गया, जिससे मृत्यु का कारण संदिग्ध रहा।
इसके अतिरिक्त, अलग-अलग पॉलिसियों के प्रस्ताव फॉर्म में नॉमिनी लक्ष्मी को कहीं भतीजी तो कहीं बहन दर्शाया गया था। आयोग ने इसे कपटपूर्ण आशय का पुख्ता प्रमाण माना।
सभी साक्ष्यों और विधिक प्रावधानों का गहराई से विश्लेषण करने के बाद पीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि एलआईसी द्वारा इन दावों को निरस्त करना किसी भी प्रकार से सेवा में कमी की श्रेणी में नहीं आता है।
आयोग ने माना कि ये पॉलिसियां कपटपूर्ण तरीके से प्राप्त की गई थीं और उचित अनुबंध के मानकों को पूरा नहीं करती हैं। तदनुसार, आयोग ने सातों परिवाद निरस्त कर दिए।
यह निर्णय उपभोक्ताओं के लिए एक कड़ा विधिक संदेश है कि बीमा लेते समय सत्यता छिपाना और विधिक औपचारिकताओं व समयसीमा की अनदेखी करना दावे की स्वतः अस्वीकृति का कारण बन सकता है।
_________________________________________
.gif)
Post a Comment
0 Comments