लोकतंत्र का सबसे ताकतवर हथियार बना आरटीआई
15 जून, 2005 को कानून बना सूचनाधिकार
--बृज खंडेलवाल--
15 जून, 2005 को भारत ने अपने नागरिकों को सिर्फ एक नया कानून नहीं दिया था। उसने उन्हें एक ताकत दी थी। सवाल पूछने की ताकत। और उससे भी बड़ी बात, जवाब मांगने का कानूनी अधिकार।
इक्कीस वर्ष पहले लागू हुए सूचना का अधिकार कानून ने सरकार और नागरिकों के रिश्ते को बदल दिया। इसने सत्ता के तराजू को, भले थोड़ा ही सही, आम आदमी की ओर झुका दिया। बंद अलमारियों में धूल खाती फाइलें लोगों की पहुंच में आईं। वर्षों से पर्दे के पीछे लिए जा रहे फैसलों पर जनता की निगाह पड़ी। संदेश साफ था। सरकारी सूचना, सरकार की नहीं, जनता की संपत्ति है।
एक वरिष्ठ एडवोकेट कहते हैं, "आरटीआई से पहले शासन का चेहरा गोपनीयता से ढका रहता था। राशन कार्ड, पेंशन, सड़क निर्माण, भूमि अभिलेख और सरकारी योजनाओं की जानकारी पाने के लिए लोगों को दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़ता था। सूचना हासिल करना अधिकार नहीं, एहसान माना जाता था।"
सूचना का अधिकार कानून ने इस सोच को बदल दिया। उसने माना कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब नागरिक जागरूक होंगे और शासन पारदर्शी होगा। इस कानून ने हर भारतीय को, उसकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति से परे, एक सरल सवाल पूछने का अधिकार दिया, जनता का पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ?
यही सवाल सत्ता के गलियारों में गूंज उठा।
पिछले दो दशकों में आरटीआई ने देश के कई बड़े घोटालों की परतें उधेड़ी हैं। महाराष्ट्र के आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले ने खुलासा किया कि कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं और सैनिकों के लिए बनी आवासीय परियोजना पर नेताओं, नौकरशाहों और प्रभावशाली लोगों ने कब्जा जमा लिया था। इस खुलासे के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को इस्तीफा देना पड़ा।
2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल की ओर से मांगी गई जानकारियों ने अनियमितताओं को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे देशव्यापी बहस छिड़ी और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों में भी आरटीआई ने अहम भूमिका निभाई। फर्जी खर्च, बढ़ी हुई लागत और कल्याणकारी योजनाओं के धन के दुरुपयोग के मामले सामने आए।
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले में डॉक्टर आनंद राय और अन्य कार्यकर्ताओं की लगातार कोशिशों तथा आरटीआई आवेदनों ने फर्जी परीक्षार्थियों, भर्ती घोटालों और संगठित भ्रष्टाचार के जाल को उजागर किया।
महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले में आरटीआई के जरिए परियोजनाओं की लागत में भारी वृद्धि और सिंचित क्षेत्र में मामूली बढ़ोतरी के बीच का विरोधाभास सामने आया।
लेकिन आरटीआई की असली ताकत सिर्फ बड़े घोटालों को उजागर करने में नहीं है। इसकी सबसे बड़ी सफलता रोजमर्रा के शासन में दिखाई देती है।
देश के गांवों और कस्बों में आम नागरिकों ने आरटीआई के जरिए पेंशन योजनाओं में फर्जी लाभार्थियों, मनरेगा में कागजी मजदूरों, राशन व्यवस्था में खाद्यान्न की चोरी और उन सड़कों के फर्जी बिलों का पर्दाफाश किया, जो कभी बनी ही नहीं थीं।
बैंकों के बढ़ते एनपीए, जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों और चुनावी बॉन्ड जैसी जटिल व्यवस्थाओं पर भी आरटीआई ने सवाल उठाए। चुनावी बॉन्ड योजना को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक और चुनाव आयोग की आपत्तियों की जानकारी भी आरटीआई के जरिए सामने आई, जिसने व्यापक जनचर्चा को जन्म दिया और अंततः सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त किया।
फिर भी, कुछ चिंताएं जायज़ हैं।
हाल के दिनों में सूचना के अधिकार आंदोलन को लेकर एक नई बहस भी छिड़ी। मई 2026 में भारत के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक सुनवाई के दौरान कुछ लोगों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे "कॉकरोच जैसे" युवा, जिन्हें पेशे में जगह नहीं मिलती, वे मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई कार्यकर्ता बनकर संस्थाओं पर हमला करते हैं।
हालांकि, बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्टीकरण दिया कि उनकी टिप्पणी देश के युवाओं या ईमानदार आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए नहीं थी। उन्होंने कहा कि उनका निशाना वे लोग थे, जो फर्जी डिग्रियों या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के साथ पेशों में प्रवेश करते हैं और संस्थाओं को बदनाम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के युवाओं पर उन्हें गर्व है और वे देश के भविष्य के स्तंभ हैं।
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "सवाल ये है कि क्या कुछ मामलों में आरटीआई का दुरुपयोग होता है? निस्संदेह, हर कानून की तरह इसका भी दुरुपयोग संभव है। लेकिन किसी अधिकार के सीमित दुरुपयोग को उसके व्यापक सामाजिक महत्व पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
सोशल एक्टिविस्ट मुक्त गुप्ता के मुताबिक, "सच यह है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं ने उन सवालों को उठाया है, जिन्हें अक्सर सत्ता और व्यवस्था अनदेखा करना चाहती है। आदर्श हाउसिंग घोटाले से लेकर व्यापम, राशन घोटालों से लेकर मनरेगा में फर्जीवाड़े तक, अनेक खुलासे ऐसे नागरिकों की बदौलत संभव हुए, जिन्होंने जोखिम उठाकर जानकारी मांगी।"
समाजशास्त्री टीपी श्रीवास्तव जोर देकर कहते हैं, "लोकतंत्र में सवाल पूछना हमला नहीं, बल्कि जवाबदेही की पहली शर्त है। संस्थाएं आलोचना से नहीं, अपारदर्शिता से कमजोर होती हैं। आरटीआई का उद्देश्य टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि विश्वास कायम करना है। क्योंकि जनता का भरोसा वहीं मजबूत होता है, जहां सूचना पर ताला नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार होता है।"
कई आरटीआई कार्यकर्ताओं को सिर्फ सवाल पूछने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। सूचना आयोगों में रिक्त पद, बढ़ते लंबित मामले और कानून में किए गए बदलावों ने इसकी प्रभावशीलता को लेकर चिंताएं भी बढ़ाई हैं।
लोकतंत्र तब कमजोर पड़ने लगता है, जब नागरिक सवाल पूछने से डरने लगें और सरकारें जवाब देने से बचने लगें।
आरटीआई की असली ताकत कानून की किताबों में नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में है। जो अधिकार इस्तेमाल नहीं होता, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है। हर आरटीआई आवेदन लोकतंत्र को जीवंत बनाता है। हर खुलासा जवाबदेही को मजबूत करता है। हर जवाब यह याद दिलाता है कि सरकारी संस्थाएं जनता की मालिक नहीं, बल्कि उसकी सेवक हैं।
सूचना का अधिकार कानून को अक्सर sun shine law, "धूप का कानून" कहा जाता है। यह उपमा बिल्कुल सटीक है। भ्रष्टाचार अंधेरे में पनपता है, पारदर्शिता रोशनी में।
_________________________________________

Post a Comment
0 Comments