ताज के साए में बगावत की कलम: जब आगरा ने रानी लक्ष्मीबाई की लड़ाई को आवाज दी
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नजरिया/बृज खंडेलवाल द्वारा
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कभी सोचा है, आगरा सिर्फ संगमरमर की चमक नहीं, इतिहास की स्याही भी है? वही आगरा, जहाँ एक विदेशी कलम ने भारतीय स्वाभिमान की कहानी लिखी।
साल 1854 में, आगरा में बसे एक ऑस्ट्रेलियाई वकील और लेखक जॉन लैंग को एक असाधारण तलबनामा मिला। यह कोई आम खत नहीं था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने फारसी में, सुनहरे कागज पर लिखकर उन्हें बुलाया था। मामला संगीन था। ईस्ट इंडिया कंपनी “Doctrine of Lapse” के नाम पर झाँसी को हड़पना चाहती थी।
महाराजा गंगाधर राव के निधन के बाद, रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को वारिस मानने से कंपनी ने इनकार कर दिया। कानून का खेल था, मगर दांव पर एक रियासत की अस्मिता थी। रानी ने सुना था कि जॉन लैंग ने पहले लाला ज्योति प्रसाद का मुकदमा जीतकर कंपनी को मात दी है। यही भरोसा उन्हें आगरा तक खींच लाया।
रानी ने लैंग के लिए खास पालकी और सेवक भेजे। आगरा से झाँसी तक का सफर आसान नहीं था। रास्ता ग्वालियर से होकर जाता था। दो दिन की थकान, लेकिन मंजिल पर एक इतिहास इंतजार कर रहा था। झाँसी पहुंचकर लैंग ने रानी से मुलाकात की। यह सिर्फ वकील और मुवक्किल की भेंट नहीं थी। यह हक और हुकूमत का आमना-सामना था।
अपनी किताब Wanderings in India में लैंग ने इस मुलाकात का जीवंत चित्र खींचा है। उन्होंने रानी के आत्मविश्वास, उनके दरबार और छोटे दामोदर राव का जिक्र किया। वही मशहूर जज्बा, जिसे इतिहास ने अमर कर दिया : “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, आने वाले तूफान की दस्तक थी।
लैंग ने रानी की ओर से एक मजबूत पिटीशन तैयार की। उन्होंने तर्क दिए, कानून रखा, न्याय की गुहार लगाई। मगर कंपनी की अदालतें पहले ही फैसला लिख चुकी थीं। मुकदमा हार गया। लेकिन कहानी जीत गई। यह घटना Indian Rebellion of 1857 के गदर या संग्राम से पहले की एक महत्वपूर्ण प्रस्तावना बन गई।
आगरा में जॉन लैंग का जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था। वर्ष 1842 में कलकत्ता आने के बाद उन्हें वह शहर रास नहीं आया। वे उत्तर भारत की ओर बढ़े। अंबाला, मेरठ और फिर आगरा। यहीं उन्होंने अपनी पहचान बनाई। वे हिंदी-उर्दू और फारसी में दक्ष थे। भारतीय मुवक्किलों के लिए वे अक्सर कंपनी के खिलाफ खड़े होते थे।
वर्ष 1845 में उन्होंने The Mofussilite नाम का अखबार शुरू किया। “मुफस्सिल” यानी छोटे शहरों की आवाज। यह अखबार अंग्रेजी हुकूमत पर तीखे व्यंग्य और सच्चाई के तीर चलाता था। कलकत्ता से शुरू हुआ यह सफर अंबाला, मेरठ होते हुए आखिरकार आगरा आकर ठहर गया। वर्ष 1853 से 1859 तक यह अखबार आगरा से प्रकाशित होता रहा।
लैंग की कलम तलवार से तेज थी। वे कंपनी की नीतियों, अन्याय और भ्रष्टाचार को बेनकाब करते थे। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज अफसर उन्हें आंख की किरकिरी मानने लगे। लेकिन भारतीय समाज में उनकी इज्जत बढ़ती गई। वे एक विदेशी होकर भी हिंदुस्तान की आवाज बन गए।
जॉन लैंग की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वे कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं लौटे। करीब 22 साल भारत में रहे। महान लेखक Charles Dickens की पत्रिका Household Words में भी उन्होंने लेख लिखे। उन्हें हिमालय की वादियां इतनी भा गईं कि उन्होंने अपने अंतिम दिन लैंडौर, मसूरी के पास बिताए।
20 अगस्त 1864 को, मात्र 48 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें मसूरी के कैमल्स बैक कब्रिस्तान में दफनाया गया। वक्त के साथ उनकी याद धुंधली पड़ गई थी, लेकिन वर्ष 1964 में मशहूर लेखक Ruskin Bond ने उनकी कब्र को खोज निकाला। जैसे इतिहास ने फिर करवट ली और लैंग की कहानी दोबारा जीवित हो उठी।
यह रिश्ता यहीं नहीं रुका। वर्ष 2014 में, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऑस्ट्रेलिया की संसद में बोले, तो उन्होंने जॉन लैंग का जिक्र किया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री Tony Abbott को 1854 की उस पिटीशन की प्रति भेंट की, जो लैंग ने रानी लक्ष्मीबाई के लिए तैयार की थी। यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, दो देशों के बीच साझा इतिहास की कड़ी थी।
आगरा को हम अक्सर ताजमहल तक सीमित कर देते हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ इमारतों का नहीं, इरादों का भी है। जॉन लैंग जैसे “मुफस्सिलाइट” ने यहां रहकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी वकालत, उनकी पत्रकारिता और रानी लक्ष्मीबाई से उनका जुड़ाव, यह सब मिलकर आजादी की कहानी में एक अनसुना, मगर जरूरी अध्याय जोड़ते हैं।
यह कहानी याद दिलाती है कि सच और साहस की कोई सरहद नहीं होती। कभी-कभी, सबसे मजबूत आवाज दूर देश से आती है, और दिलों में घर कर जाती है।
(- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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