आगरा का ट्रैफिक नर्क: सरकारी नाकामी का जीता-जागता स्मारक || आखिर, क्यों नहीं होता समाधान?

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नजरिया/बृज खंडेलवाल
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आगरा की सड़कों पर ट्रैफिक कोई व्यवस्था नहीं है।
यह रोज़ का युद्धक्षेत्र है। सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, हजारों हॉर्नों के एक साथ फटने से होती है। मेटैलिक, निर्दयी, कर्कश ऑर्केस्ट्रा। ऑटो-रिक्शा असंभव सी जगहों में घुसते हैं। मोटरसाइकिल सवार बसों और एसयूवी के बीच बेचैन मछलियों की तरह फिसलते हैं। कारें इंच-इंच आगे बढ़ती हैं, फिर थम जाती हैं, फिर अंधी उम्मीद में झटके से आगे बढ़ती हैं। यहाँ नियम नहीं, जो सबसे ज़्यादा शोर करे वही बचता है।
अचानक एक एंबुलेंस दिखती है। सायरन चीखता है। लाल बत्ती बेतहाशा घूमती है। वह गुहार लगाती है। चिल्लाती है। बस थोड़ी-सी जगह मांगती है। कोई नहीं हिलता। या शायद कोई हिल ही नहीं सकता। वह फंसी रहती है, भीतर कहीं किसी की ज़िंदगी ठहरी हुई है।
एक पीली स्कूल बस जाम में जकड़ी खड़ी है। बच्चे खिड़कियों से चेहरे सटाए हैं। कुछ चिंतित। कुछ मनोरंजन लेते हुए। कुछ बाहर के नाटक को बड़ी आंखों से देखते हुए। ड्राइवर खिड़की से झुककर लेन में अटकी डिलीवरी वैन पर चिल्लाता है। वैन चालक जवाब देता है। फिर तीन और लोग जुड़ जाते हैं। शब्द गाड़ियों से तेज़ उड़ते हैं।
डिवाइडर पर गायें फिल्मी डॉन की तरह विराजमान हैं। एक कुत्ता आत्मविश्वास के साथ टायरों के बीच से निकल जाता है। एक बंदर ट्रैफिक सिग्नल पर बैठा अपने साम्राज्य का मुआयना कर रहा है। शुक्र है कि अभी शेर या मगरमच्छ नहीं हैं, हालांकि यहां के जंगलराज को देखकर हैरानी भी नहीं होगी।
एक ट्रैफिक कांस्टेबल पसीने से तर, गला बैठा हुआ, डूबते आदमी की तरह हाथ हिलाता है। सीटी बजाता है। चिल्लाता है। धमकाता है। कोई नहीं सुनता। जब तक अचानक किसी वीआईपी काफिले का सायरन इस अराजकता को चीर नहीं देता। पल भर में लेनें सीधी कर दी जाती हैं। गाड़ियां किनारे धकेली जाती हैं। व्यवस्था बलपूर्वक पैदा की जाती है।
और फिर जैसे अचानक जाम बना था, वैसे ही ढीला पड़ जाता है।
अगले चौराहे तक।
अगली लड़ाई तक।
आगरा में ट्रैफिक जाम अब एक पूर्ण संकट बन चुका है, जो शहर की गौरवशाली विरासत का मज़ाक उड़ाता है। यमुना किनारा रोड, एमजी रोड, हरी पर्वत, मडिया कटरा, जीवनी मंडी, गधा पाड़ा, बाईपास रोड, रामबाग चौराहा और फतेहाबाद रोड , सब बदहाली की मिसाल हैं। वाहन गुड़ में फंसे घोंघों की तरह रेंगते हैं। प्रशासन और पुलिस लाचार खड़े हैं। रोज़मर्रा के यात्रियों की पुकार कोई नहीं सुनता। यह एक चौराहे की कहानी नहीं; पूरा शहर लकवाग्रस्त है।
नेता समयाभाव का रोना रोते हैं। मेयर और पार्षद दिखावटी मेगा-प्रोजेक्ट्स के पीछे भागते हैं। मेट्रो रेल प्राधिकरण ने अराजकता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। कोई कहीं समय पर नहीं पहुंचता। राहत के वादे क्रूर मज़ाक लगते हैं। सही में, आगरा एक अलग पीड़ा झेल रहा है ; धुएं में फंसे पर्यटक उसी स्मारक को धुंध में खोता देखते हैं, जिसे देखने आए थे।
कारण साफ हैं , और शर्मनाक भी। वाहनों की संख्या बेकाबू बढ़ी है। 2020 तक उत्तर प्रदेश में 3.49 करोड़ से अधिक वाहन पंजीकृत थे, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हर घर में दो-तीन गाड़ियां। सड़कें चलती-फिरती पार्किंग बन गई हैं।
सार्वजनिक परिवहन? नाममात्र का। बसें अविश्वसनीय। विकल्प इतने कमजोर कि निजी वाहन मजबूरी बन गए हैं।
ट्रैफिक प्रबंधन मज़ाक है। सिग्नल खराब। नियमों की खुली धज्जियां। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, सिग्नल तोड़ना आम बात। पुलिस या तो नदारद, या मूकदर्शक। सड़कें संकरी, गड्ढों से भरी, पाइपलाइन और केबल के लिए लगातार खुदाई। फुटपाथ अवैध अतिक्रमण में गुम, पैदल यात्री सड़क पर धकेले गए।
अवैध पार्किंग सड़कों की चौड़ाई खा जाती है। निर्माण स्थल, खासकर आगरा मेट्रो, ने शहर को बाधाओं का विशाल मैदान बना दिया है। एमजी रोड पर एलिवेटेड कॉरिडोर और स्टेशनों का निर्माण अराजकता को और बढ़ा रहा है। “प्राथमिकता कॉरिडोर” सुस्त रफ्तार से चल रहा है, पूर्ण संचालन 2026 तक टलता दिखता है; तब तक खुदाई और जाम दोनों जारी।
त्योहार, जुलूस, अचानक भीड़ — सब जाम को युद्धभूमि बना देते हैं। ड्राइविंग आदतें? बर्बर। लेन अनुशासन शून्य। लगातार हॉर्न। खतरनाक कट।
अव्यवस्थित शहरी विस्तार ने आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों को बिना योजना के जोड़ दिया है। कॉलोनियों से अनियंत्रित एंट्री सीधे मुख्य सड़कों पर अराजकता उगलती है।
नतीजा : समय की बर्बादी, आसमान छूता प्रदूषण, रोड रेज, टूटी नसें। 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, केवल पीएम10 प्रदूषण का बोझ आगरा पर सालाना 202.58 मिलियन डॉलर का है। ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, श्वसन रोग, हृदय समस्याएं — बच्चे और वयस्क दोनों इसकी मार झेलते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह अव्यवस्था जीडीपी का 1.5 से 2 प्रतिशत तक निगल जाती है। धुंध ताज को ढक देती है। पर्यटक डरते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था कराहती है।
कड़वी सच्चाई? सत्ता में बैठे लोगों को परवाह नहीं। नेता “स्मार्ट सिटी” के दावे करते हैं, जबकि आम आदमी धुएं में सड़ता है। मेट्रो अधिकारी निर्माण के दौरान सड़कों की “ऐसी-तैसी” कर देते हैं, समयसीमा खिसकती जाती है। पुलिस हाथ मलती है। प्रशासक फोटो-ऑप में व्यस्त।
यह शासन नहीं, आपराधिक लापरवाही है। ऐतिहासिक आगरा धूल और हॉर्नों की जेल में बदल चुका है। जब तक जवाबदेही बहानों की जगह नहीं लेती, आगरा गौरव का नहीं, सामूहिक विफलता का स्मारक बना रहेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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