चैंबर चुनाव: फिर निकला राजनीतिक दल से जुड़ाव का "जिन्न!" || आखिर क्यों टूटी "राम-हनुमान की जोड़ी?"
आगरा, 28 फरवरी। नेशनल चैम्बर के चुनावों के लिए चल रही गहमागहमी के बीच एक बार फिर राजनीतिक दल से जुड़ाव का सवाल चर्चाओं में आ गया है। गौरतलब है कि दो साल पूर्व हुए चुनाव में एक प्रत्याशी को लेकर यह में मुद्दा जोर पकड़ गया था। लेकिन उस समय चुनाव समिति ने एक राजनीतिक दल के महानगर अध्यक्ष द्वारा दिए गए पत्र को मान लिया था, जिसमें चैंबर प्रत्याशी के उनकी पार्टी में किसी पद पर न होने की बात कही गई थी।
लेकिन सूत्रों का दावा है कि प्रत्याशी का जुड़ाव राजनीतिक दल से बना रहा। भविष्य में इस प्रकार की स्थिति को टालने के लिए पिछले साल चैंबर के संविधान में संशोधन कर प्रावधान को और अधिक स्पष्ट कर दिया गया।
नए प्रावधानों में कहा गया है-
"कोई भी प्रत्याशी जो चैम्बर के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष कोषाध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहता है, वह अपना नामांकन पत्र प्रस्तुत करने की तिथि पर किसी राजनैतिक संगठन का पदाधिकारी नहीं हो और चैम्बर के किसी भी पद पर अधिष्ठित रहने तक किसी भी राजनैतिक संगठन का कोई भी पदभार ग्रहण नहीं कर सकेगा। राजनैतिक पद से आशय किसी भी राजनैतिक पार्टी के सदस्य से ऊपर के किसी भी छोटे अथवा बड़े पद (पद से आशय मुख्य राजनैतिक पार्टी अथवा उसके आनुषंगिक (सहायक) संगठन अथवा उसके प्रकोष्ठ किसी में भी पद से है) अथवा किसी राजनैतिक संवैधानिक पद जैसे-पार्षद, विधायक, सांसद आदि की जिम्मेदारी का निर्वहन करने से है। यदि संस्था का सदस्य संस्था के किसी भी पद के लिए उम्मीदवारी का नामांकन करने से पूर्व किसी भी राजनैतिक पार्टी का पदाधिकारी हैं, तब उसे उस राजनैतिक पार्टी के अपने पद से त्यागपत्र देकर पद त्याग की अधिकृत पुष्टि से चैम्बर की संतुष्टि का दायित्व सम्बन्धित सदस्य का होगा। यदि सदस्य द्वारा राजनैतिक पार्टी का पद त्याग देने की पुष्टि के बाद चैम्बर चुनाव के नामांकन की पुष्टि होने के उपरांत अथवा चैम्बर के पद पर आसीन होने के बाद पूरे कार्यकाल में यदि सदस्य की संलिप्तता राजनैतिक पार्टी के पूर्व पद अथवा नये पद पर आसीन होने की पुष्टि अथवा भ्रम की स्थिति बनती है तो (पुष्टि होने के आधार के लिए विजिटिंग कार्ड, लैटर, स्टिकर, पोस्टर अथवा किसी भी प्रकार के प्रिन्ट मीडिया, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया या अन्य किसी भी मीडिया के प्रदर्शन को उस सदस्य का पार्टी के पद पर बने रहने का पर्याप्त साक्ष्य माना जायेगा।) उस स्थिति में उसके खंडन से चैम्बर को संतुष्ट करने का दायित्व सम्बन्धित सदस्य अथवा उस पदाधिकारी सदस्य का होगा। चैम्बर द्वारा संतुष्ट न होने पर उसे कोर कमेटी द्वारा पदमुक्त कर दिया जायेगा।"
अब देखना होगा कि चैंबर के संविधान में किए गए संशोधन का कितनी कड़ाई से पालन होगा। इस बारे में पूछे जाने पर चैंबर चुनाव समिति के अध्यक्ष मनीष अग्रवाल ने कहा कि सभी प्रत्याशियों से स्व-घोषणापत्र लिया गया है। फिर भी यदि किसी प्रत्याशी के बारे में आपत्ति आएगी तो उसके बारे में पूरी कड़ाई से पड़ताल की जाएगी और उसी आधार पर कोर कमेटी को अनुशंसा भेज दी जाएगी।
इस पर कुछ जानकारों ने कहा कि आपत्ति तभी की जा सकेगी, जबकि चुनाव समिति यह घोषित करे कि कौन- कौन प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। उसके बाद यदि कोई आपत्ति आती है तो उसकी जांच के बाद ही नामांकन पत्रों की जांच का कार्य पूरा किया जाना चाहिए। एक पूर्व अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि चुनाव समिति चाहे तो चर्चाओं का स्वतः संज्ञान लेकर भी इस बारे में जांच कर सकती है।
अब यह चुनाव समिति पर निर्भर करता है कि वह क्या कदम उठाती है। क्या किसी शिकायत का इंतजार किया जाएगा या अपने स्तर पर जांच की जाएगी।
आखिर क्यों टूटी "राम-हनुमान की जोड़ी?"
चुनाव प्रचार तेज होने के साथ ही एक "राम-हनुमान की जोड़ी" भी चर्चा में आ गई है। एक प्रत्याशी को पिछले वर्ष सितम्बर माह तक अपना हनुमान बताने वाले एक पूर्व अध्यक्ष और प्रत्याशी द्वारा भी सहमति जताने की खूब चर्चा थी। लेकिन अब ये दोनों हो विपरीत खेमे में नजर आ रहे हैं।
सूत्रों का दावा है कि बीते सितंबर माह में अपने एक पुराने साथी का नाम अध्यक्ष पद के लिए सामने आने के बाद ही पूर्व अध्यक्ष का झुकाव उसकी ओर हो गया और उनकी अपने "हनुमान" से दूरी हो गई। दोनों ओर से सोशल मीडिया पर अपने-अपने दावे किए जाने से यह दूरी बढ़ती चली गई। पूर्व अध्यक्ष ने शुरुआत में अपने "हनुमान" को समझाने का प्रयास किया, लेकिन पूरी तरह चुनाव में कूदने का मन बना चुके "हनुमान" पर कोई असर नहीं हुआ। "हनुमान" ने कुछ अन्य वरिष्ठों के साथ मिलकर तैयारियां तेज कर दीं। यह देख दूसरे पक्ष ने भी सहमति की आस छोड़ चुनाव पर ध्यान जमा लिया है। दोनों ही पक्ष अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं।
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