महापौर ने नगरायुक्त पर लगाए गम्भीर आरोप, मुख्यमंत्री से मुलाकात कर नगर निगम में नौ करोड़ के गबन की थर्ड पार्टी जांच कराने की मांग
आगरा, 21 मार्च। महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा ने शनिवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर नगर निगम आगरा में अधिकारियों द्वारा किए जा रहे वित्तीय गबन की थर्ड पार्टी द्वारा जांच कराने के लिए आग्रह किया।
महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि नगर निगम आगरा में नगरायुक्त अंकित खंडेलवाल द्वारा नगर निगम अधिनियम 1959 के प्राविधानों के उल्लंघन एवं गम्भीर वित्तीय अनियमितता की जा रही है। इसकी शासन द्वारा थर्ड पार्टी जांच होना अति आवश्यक है। महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि नगरायुक्त द्वारा ई-टेंडरिंग की उपेक्षा कर ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली के माध्यम से लगभग नौ करोड़ रुपये की गड़बड़ी की गई है और ठेकों में मॉनोपॉली स्थापित की गई है।
पत्र लिखने के बाद भी नहीं दिया कोई विवरण
महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि धारा 117 (6) का नियम विरूध्द प्रयोग नगर निगम अधिनियम 1959 की धारा 117-6बी के अन्तर्गत प्रदत्त विशेषाधिकार केवल "अपरिहार्य आकस्मिकता" हेतु हैं। संज्ञान में आया है कि लेकिन नगरायुक्त द्वारा इस धारा का प्रयोग सामान्य प्रक्रिया के रूप में किया गया है और इसकी सूचना नगर निगम की कार्यकारिणी समिति को भी उपलब्ध नहीं करायी गयी। इसके लिए नगरायुक्त को बार-बार निर्देशित किया गया। इसके उपरान्त भी नगरायुक्त द्वारा हठधर्मिता दिखाते हुए कोई विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया।
ऑफलाइन बॉक्स के माध्यम से की जा रही वित्तीय हानि
महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि ई-टेन्डरिंग की उपेक्षा करके इसके विपरीत लगभग 40 से 50 करोड़ के कार्य "ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली" (रू10.00 लाख) की सीमा के भीतर) से कराये गये हैं, जिनमें अधिकतम 5 प्रतिशत निम्न दरें प्राप्त हुई। इस सुनियोजित प्रक्रिया से नगर निगम को अनुमानतः रू 9.00 करोड़ की प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति पहुँची है। इन कार्यों में एक ही ठेकेदार / प्रतिभागी को 10-10 पत्रावलियों आवंटित की गई हैं, जो कि "रोस्टर प्रणाली" और "समान अवसर" के सिध्दान्तों का खुला उल्लंघन है। यह स्थिति कार्य आवंटन की निष्पक्षता पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।
शिकायत के बाद भी जारी वित्तीय हानि
महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि उक्त के दृष्टिगत नगर निगम के वित्तीय हितों के संरक्षण हेतु उनके द्वारा नगर आयुक्त, नगर निगम आगरा को अपने कार्यालय के पत्रांक 42/डी/म०पौ० कै०का0/26 दिनांक 17.03.2026 प्रेषित किये गये तथा मौखिक रूप से भी कई बार निर्देशित किया गया तथा समय-समय पर इनकी कृत्यों के सम्बन्ध में मुख्य सचिव उप्र शासन को प्रेषित किये गये पत्रांक 732/डी/म.पौ.कै.का/25 दिनांक 18.03.2025 व प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग को भी पत्र प्रेषित किये जा चुके हैं। लेकिन नगरायुक्त द्वारा लगातार नगर निगम को वित्तीय हानि पहुंचाई जा रही है। इसकी थर्ड पार्टी जांच कराना जनहित व शासन के लिए अति आवश्यक है।
जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र सहित जनहित मुद्दों पर भी मुख्यमंत्री से चर्चा
महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा ने इस दौरान मुख्यमंत्री को बताया कि शहर के नागरिकों को जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नियमानुसार 21 दिन की समयावधि के बाद जांच कराने एवं आदेश जारी करने का अधिकार उप जिलाधिकारी में निहित किया गया है, परन्तु उप जिलाधिकारी स्तर से जांच कराने एवं जांच के बाद सक्षम आदेश पारित करने में नियमावली में दिये गये समय से अधिक समय लग रहा है। आमजन को तीन से चार महीने तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। जिसके कारण आम नागरिक नगर निगम में व्यापक शिकायत करते हैं तथा सम्पूर्ण दोष नगर निगम पर लगाते हैं।
महापौर ने मुख्यमंत्री के समक्ष कहा कि वर्तमान प्रकिया में जटिलता समाप्त करने की आवश्यकता है तथा पूर्व व्यवस्था में नगर निगमों में उप निबन्धक (जन्म-मृत्यु) को एक महीने की अवधि तक बिना शपथ पत्र के लिए रजिस्ट्रेशन करने तथा एक वर्ष की अवधि के अन्दर शपथ पत्र के माध्यम से रजिस्ट्रेशन का अधिकार था व एक वर्ष की अवधि के उपरान्त अपर जिला मजिस्ट्रेट को अधिकार था। इस व्यवस्था के कारण किसी भी प्रकार की कठिनाई आम नागरिकों को नही होती थी। परन्तु नयी पद्धति / प्रक्रिया के अनुसार 21 दिन की अवधि के उपरान्त रजिस्ट्रेशन करने का अधिकार उप जिलाधिकारी में निहित किया गया है। चूँकि उप जिलाधिकारी के पास अपनी तहसील का बहुत कार्य होता है जिसके कारण इन कार्यों के लिए उनके पास समय का अभाव रहता है और जन्म-मृत्यु के प्रकरण लम्बित हो जाते हैं।
जनहित में प्रक्रिया में बदलाव हो जाये तो काफी हद तक आम नागरिकों को परेशानियों से निजात मिल सकती है। मेरा सुझाव है कि नगर निगम में एक पीसीएस अधिकारी की तैनाती रहती है जिनको एक वर्ष तक की अवधि प्रकरणों के निस्तारण के लिए अधिकृत किया जा सकता है तथा एक वर्ष से अधिक समय होने पर जिलाधिकारी के अधीन किसी भी अपर नगर मजिस्ट्रेट को जन्म-मृत्यु के प्रकरणों को सुनने, निर्णय किये जाने का अधिकार दिया जा सकता है। वर्तमान में जन्म-मृत्यु की जो ऑनलाइन साइड है, वह भी बहुत ही धीमी गति से कार्य कर रही है। अतः उपरोक्त के दृष्टिगत सादर अनुरोध है कि नगर निगमों के स्तर पर प्रकिया में बदलाव किये जाने पर विचार करते हुए सम्बन्धित अधिकारियों को निर्देशित करने की कृपा करें।
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