एक शिक्षक का जाना...
प्रो. सक्सेना का निधन शिक्षा जगत की अपूर्णनीय क्षति
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लेखक - डॉ. अनिल दीक्षित
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बात एक नवम्बर 2001 की है। प्रो. गिरीश चंद्र सक्सेना ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के कुलपति का कार्यभार संभाला। मूल रूप से आगरा के थे, लेकिन अवध विश्वविद्यालय से कुलपति का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद आगरा आए थे। कार्य संभालने के दिन उनसे मुलाकात हुई। मैं उस समय दैनिक जागरण आगरा में हायर एजुकेशन रिपोर्टर था। संक्षिप्त सी मुलाकात हुई, उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं बताईं और हम सभी पत्रकार चले गए। हमें कुलपति से अपने मन मुताबिक समय पर मिलने की आदत थी, तर्क ये कि दिनभर की रिपोर्टिंग में जब समय मिलेगा तब विश्वविद्यालय जाएंगे और कुलपति की भलमनसाहत ये, कि वो मिलने से मना नहीं करेंगे। अब भला पत्रकारों की ऐंठ को कौन झेले। उनके पूर्ववर्ती कुलपति प्रो. गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने ये आदत डलवाई, हम जब मिलने जाते हमसे मिल लेते।
लेकिन अब कुर्सी पर नई शख्सियत थी, आगरा के लिए पुराने थे लेकिन कुलपति के तौर पर हम लोगों के लिए नए। मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे एक जूनियर ने एक दिन मुझे फोन करके कहा कि हम कुलपति से मिलने आए थे, लेकिन कुलपति ने कहा है कि वह तय समय पर मिलेंगे और समय तय किया गया है शाम को 4:00 बजे। मैं 10 मिनट में कुलपति कार्यालय पहुंच गया। और आदत के अनुरूप बिना इजाजत अंदर दाखिल भी हो गया। कुछ भी पूछे और बोले बिना मैंने सिर्फ इतना कहा कि ठीक है, यदि आप हमारे समय पर नहीं मिलेंगे तो हम भी आपसे नहीं मिलेंगे। तीन दिन हमने खबरें तो लिखीं लेकिन कुलपति का नाम नहीं लिखा। तब विरोध का यही तरीका होता था, खबरें रोकने की हमें इजाजत नहीं होती थी।
चौथे दिन प्रो. सक्सेना ने खुद फोन किया, अरे, अनिल खुद बोल गए, मेरी तो सुनी नहीं। अभी आओ, अभी बात करेंगे। मैं पहुंच गया, मैंने अभिवादन किया मुझसे बोले, मैंने मना कब किया था। आगरा मेरा परिवार है और तुम मेरे बच्चे हो, अपने परिवार से तो कभी भी मिल सकता हूं। मैं निरुत्तर था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और रसायन विज्ञान की दुनिया के विख्यात वैज्ञानिक स्वभाव से इतने सरल हैं। उसके बाद हम जब भी जाते, देखते कि वो लोगों की बात दिल से सुनते हैं। विश्वविद्यालय का उस समय बहुत बुरा हाल था। लेकिन जैसे जादूगर थे प्रो. सक्सेना। आगरा में पले बढ़े और आगरा से ही पुष्पित पल्लवित थे तो शिक्षा जगत की हर समस्या की नस-नस पहचानते थे।
कोई समस्या होती तो सीधे संबंधित व्यक्ति को बुलाते, सामने समस्या का समाधान कराते और जटिल समस्याओं के लिए डेडलाइन देते। एक सनकी आईपीएस और फिर कार्यवाहक कुलपति के कार्यकाल में पूरी तरह ढर्रे से उतर गया विश्वविद्यालय पटरी पर आने लगा। मुझे नहीं याद कि कोई ऐसी समस्या थी, जिसका समाधान उन्होंने नहीं किया होगा। अखबारों में लिखी हमारी खबरों का लेखा-जोखा विश्वविद्यालय में रखा जाता और उन पर कार्रवाई होती।
उनके जमाने में रिक्त पदों पर नियुक्तियां हुईं, शिक्षकों के प्रमोशन हुए और कभी कोई ऐसा आरोप नहीं लगा जो आजकल के गंभीर मामलों की श्रेणी का हो। सब कुछ ठीक हो रहा था लेकिन हम पत्रकारों से फिर भी उन्हें कभी-कभी शिकायत हो जाती। सबके सामने कह देते, अरे भाई! खबर लिखने से पहले मुझे बता देते तो मैं समस्या सॉल्व कर देता तो हम कहते फिर हम क्या लिखते! इसके बाद ठहाका लगाकर हंस पड़ते। उसी दौरान का एक वाकया और है। मैंने एक खबर लिखी- 'बंद लिफाफे में हैं यह नाम।' और खबर में रिक्त पदों पर जिन लोगों को नियुक्त किया गया था, उनके नाम सूची बनाकर लिख दिए। रिवाज ये है कि इंटरव्यू के बाद लिफाफे बंद कर दिए जाते हैं और उन्हें कार्य परिषद की बैठक में खोला जाता है।
मुझे अपने एक सूत्र से यह खबर मिली थी। खोजी पत्रकारिता थी। अगले दिन विश्वविद्यालय में सनसनी फैल गई। कुलपति ने नाराजगी जताई- अनिल, तुम्हारे छापे हुए सारे नाम फर्जी हैं। मैंने कहा, सर, कार्य परिषद की बैठक के बाद देख लेंगे। बोले- ठीक है। मुस्कुराए, यदि खबर गलत हुई तो तुम्हें ये उच्च शिक्षा की बीट छोड़नी पड़ेगी। कार्य परिषद की बैठक में जब लिफाफे खुले तो मेरे छापे हुए ज्यादातर नामों की पुष्टि हुई।
कार्य परिषद की बैठक के बाद लंच में मेरे लिए खुद प्लेट में खाना रखकर लाए और बोले, तुम्हें बधाई हो, लो मेरी तरफ से मीठा खाओ। फिर पीठ थपथपा कर चले गए। आज के दौर में यह महज कल्पना है कि कोई कुलपति अपनी गोपनीय बात के सार्वजनिक होने के बाद मुस्कुराए। न उन्होंने किसी से पूछा कि यह वह खबर कहां से लीक हुई और न विश्वविद्यालय में कभी किसी से कोई शिकायत की। लंच के बाद इतना जरूर बोले थे कि हमने हमारा काम किया और तुमने अपना।
कार्यकाल समाप्ति के बाद भी हम लोग निरंतर संपर्क में रहे। और जब जरूरत पड़ी, मैंने उनसे बात की और उन्होंने पुत्रवत व्यवहार किया। हमेशा स्नेह से बात करते। आखिरी बार मेरी बातचीत मेरे प्रस्तावित रिसर्च जर्नल को लेकर हुई। जिन व्हाट्सएप ग्रुप में हम दोनों थे, उनकी सक्रियता हमेशा देखता रहा। एजुकेशन ग्रुप में भी वो लंबे समय तक महान लोगों से जुड़े संस्मरण और उनके जन्मदिन पर लेख शेयर करते रहे। जीवन की अंतिम सांसों तक उनके अंदर का शिक्षक जीवित रहा।
आज अचानक जब उनके निधन की खबर मैंने सुनी तो आघात लगा। एक मार्गदर्शक का खोना बहुत बड़ी क्षति है। ऐसी शख्सियत बहुत कम जन्म लेती हैं। अपने जीवन में उन्होंने इतने पुण्य कार्य किए कि यदि पुनर्जन्म होता होगा तो अगले जन्म में भी वह ऐसे ही सर्वश्रेष्ठ इंसान और शिक्षक बनेंगे। मेरी तरफ से उन्हें भावभरी श्रद्धांजलि।
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